१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें५२२ ] सीतोपनिषत् साक्षाच्छक्तिर्भगवतः स्मरणमात्ररूपाऽऽविर्भावप्रादुर्भावा- त्मिका निग्रहानुग्रहरूपा शान्ततेजोरूपा व्यक्ताव्यक्तकारणचरण- समग्रावयवमुख वर्णभेदाभेदरूपा भगवत्सहचारिणी अनपायिनी अनवरतसहाश्रयिणो उदितानुदिताकारा विमेषोन्मेषसृष्टिस्थिति- संहारतिरोधानानुग्रहादिसर्वशक्तिसामर्थ्यात् साक्षाच्छक्तिरिति गीयते ॥ ३४ ॥ इच्छाशक्तिस्त्रिविद्या । प्रलयावस्थायां विश्रमणार्थं भगवतो दक्षिणवक्षःस्थले श्रीवत्साकृतिर्भूत्वा विश्रम्यतीति सा योगशक्तिः ॥ ३५ ॥ भोगशक्तिर्भोगरूपा कल्पवृक्षकामधेनुचिन्तामणिशङ्खपद्म- निध्यादिनवनिधिसमाश्रिता भगवदुपासकानां कामनया अकाम- नया वा भक्तियुक्ता नरं नित्यनैमित्तिककर्मभिरग्निहोत्रादिभिर्वा यम नियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिभिर्वा गोपुरप्राकारादिभिर्विमानादिभिः सह भगवद्विग्रहार्चापूजोपकरणै- रर्चनैः स्नानादिभिर्वा पितृपूजादिभिरन्नपानादिभिर्वा भगवत्प्रीत्य- र्थमुक्त्वा सर्वं क्रियते ॥ ३६ ॥ 'प्राचीन काल की बात है वैखानस ऋषि के हृदय में भगवान् विष्णु की वाणी क्त हुई । वही वाणी वेदत्रयी के रूप में कल्पित हुई ॥ ३२ ॥ वैखानस ने उस वाणी की संख्या रूप में इस प्रकार प्रकट किया कि ब्रह्ममय रूप को धारण करने वाली क्रियाशक्ति ही भगवान् की साक्षात् शक्ति है ॥ ३३ ॥ भगवान् की इच्छा मात्र से वह संसार के रूपों को प्रकट करती हुई, दिखाई पड़ने वाले इस संसार में स्वयं व्यक्त होती हैं। वे शान्ति और तेजोमया, कृपास्वरूपा और शासनमयी, व्यक्त-अव्यक्त की कारणभूता, भगवान् की अनुगामिनी, उनसे अभिन्न, प्रभु-आश्रिता, कथनीय एवं अकथनीय रूप वाली, निमेष-उन्मेष, उत्पत्ति,