१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextकुहर में प्रविष्ट करने और दोनों भौंहों के बीच दृष्टि स्थिर करने से खेचरी मुद्रा होती है ॥५२॥ इसका साधन करने से न रोग, न मरण न भूख और न क्षुधा का भय रहता है । जो खेचरी मुद्रा को जानता है उसे मूर्च्छा भी नहीं होती ॥५३॥ वह रोग से कभी पीड़ित नहीं होता और न कर्मों में लिप्त होता है । जो खेचरी को जानता है उसे कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता ॥५४॥ जिस खेचरी मुद्रा के साधन से चित्त आकाश में विचरण करता है और जिह्वा भी आकाश में विचरण करती है, उसको सिद्ध नमस्कार करते हैं ॥५५॥ बिन्दूमूलशरीराणि सिरा यत्र प्रतिष्ठिताः । भावयन्ति शरीराणि आपादतलमस्तकम् ॥५६ खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः । न तस्य क्षीयते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च ॥५७ यावद्विन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः । यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्विन्दुर्न गच्छति ॥५८ ज्वलितोऽपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् । व्रजत्यूर्ध्वं गतः शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया ॥५९ स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा । पाण्डरं शुक्लमृत्याहुर्लोहिताख्यं महारजः ॥६० पैर से लेकर शिर तक के समस्त अङ्गों का पोषण करने वाली शिराओं का आधार बिन्दु है ॥५६॥ जिससे खेचरी मुद्रा द्वारा जिह्वा के ऊपर विवर (कपाल कुहर) को बन्दकर लिया है, उसका बिन्दु (वीर्य) फिर किसी तरह नष्ट नहीं हो सकता, रमणी के आलिंगन का भी उस पर प्रभाव नहीं पड़ता ॥५७। जब तक देह में वीर्य स्थित है तब तक मृत्यु का क्या भय है ? और जब तक खेचरी मुद्रा बाँधी हुई है तब तक बिन्दु नहीं जाता ॥५८॥ यदि बिन्दु निकलकर अग्नितत्त्व को प्राप्त हो