१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context७८ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् जाए, तो भी योनि मुद्रा द्वारा शक्तिपूर्वक उसे रोक कर ऊर्ध्वगामी किया जा सकता है ॥५९॥ यह बिन्दु दो प्रकार का होता है, एक सफेद और दूसरा लाल, सफेद का नाम शुक्ल और लाल का नाम महाराज कहा जाता है ॥६०॥ सिन्दूरव्रातसंकाशं रविस्थानस्थितं रजः । शशिस्थानस्थितं शुक्लं तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ॥६१ बिन्दुब्रह्मा रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः । उभयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥६२ वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रजः । याति बिन्दुः सदैकत्वं भवेद्दिव्यवपुस्तदा ॥६३ शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्यसमन्वितम् । तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित् ॥६४ शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः । रसानां शोषणं चैव महामुद्राऽभिधीयते ॥६५ रज का स्थान सिन्दूर के समान चमकने वाला रवि-स्थान है और शुक्र का चन्द्र स्थान है, इन दोनों का संयोग होना बड़ा कठिन होता है ॥६१॥ बिन्दु ब्रह्मा है और रज शक्ति है, विन्दु चन्द्रमा रूप है तथा रज सूर्य रूप है इन दोनों के संगम से परम पद की प्राप्ति होती है ॥६२॥ जब वायु द्वारा चालित रज बिन्दु से मिलकर एक हो जाता है तब देह दिव्य हो जाती है ॥६३॥ शुक्ल चन्द्र से और रज सूर्य से संयुक्त है, जो इनकी एकता को, विषय को समझता है वह योग को जानने वाला है ॥ ६४ ॥ अब महामुद्रा को बतलाते हैं, जिससे नाड़ी जाल का शोधन, चन्द्र सूर्य का चलाना और रस का सुखाना होता है ।। ६५ ।।