१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextयोगचूड़ामणि उपनिषत् [ ८३
प्राज्ञ है। 'अ'कार राजस, रक्तवर्ण और ब्रह्मा कहा जाता है। 'उ'कार सात्विक, शुक्लवर्ण और विष्णु कहा जाता है, तथा 'म'कार को तामस, कृष्ण वर्ण और रुद्र के नाम से पुकारा जाता है। इस प्रकार प्रणव से ही ब्रह्मा की उत्पत्ति है, प्रणव में ही विष्णु की उत्पत्ति है और प्रणव से ही रुद्र उत्पन्न हुआ है। प्रणव ही परातत्त्व है। ब्रह्मा 'अ'कार में लय हो जाते हैं, 'उ'कार में विष्णु का लय होता है और 'म'कार में रुद्र लय होते हैं, केवल प्रणव ही प्रकाशित (स्थिर) रहता है। वह ज्ञानी में ऊर्ध्वमुख होता है और अज्ञानी में अधोमुख होता है। इस प्रकार प्रणव ही निश्चय रूप से स्थित है और उसको जानने वाला ही वेदवित् कहा जाता है। वह अनाहत रूप से ज्ञानियों में ऊर्ध्वगति होता है ॥ ७५— ७६ ॥ प्रणव की यह अनाहत ध्वनि तेल की अवच्छिन्न धार और घण्टा के दीर्घ निनाद (शब्द) के समान होती है और अग्रभाग ही ब्रह्म कहा जाता है ॥ ८० ॥
ज्योतिर्मयं तदग्रं स्यादवाच्यं बुद्धिसूक्ष्मतः । दहश्ये महात्मानो यस्तं वेद स वेदवित् ॥८१ जाग्रन्नेत्रद्वयोर्मध्ये हंस एव प्रकाशते । सकारः खेचरी प्रोक्तस्त्वंपदं चेति निश्चितम् ॥८२ हकारः परमेशः स्यात्तत्पदं चेति निश्चितम् । सकारो ध्यायते जन्तुर्ह कारो हि भवेद्ध्रुवम् ॥८३ इन्द्रियैर्बध्यते जीव आत्मा चैव न बध्यते । ममत्वेन भवेज्जीवो निर्ममत्वेन केवलः ॥८४ भूर्भुवः स्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः । यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति ॥८५
वह अग्रभाग (ब्रह्म) ज्योतिर्मय और वाणी से परे है, महा- पुरुष उसे सूक्ष्म बुद्धि द्वारा देखते हैं, उसको जानने वाला ही वेदवित्