१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context८४ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् है ॥ ८१ ॥ जाग्रत अवस्था में दोनों नेत्रों के मध्य हंस प्रकाशित होता है। इसमें 'स'कार खेचरी रूप है और वह निश्चित रूप से 'त्वं' का पद है। 'ह'कार परमेश्वर का पद है और उससे निश्चित रूप से तत्' प्रकट होता है। जो जीव 'स'कार का ध्यान करता है वह निश्चित रूप से 'ह'कार ईश्वर ) हो जाता है ॥ ८२-८३ ॥ इन्द्रियाँ जीव को बन्धन में डालती हैं, वे आत्मा को नहीं बाँध सकतीं। ममता होने में जीव रहता है और ममता के छूट जाने पर कैवल्य स्वरूप हो जाता है ॥ ८४ ॥ भूलोक, भुवःलोक और स्वर्लोक तथा चन्द्र, सूर्य और अग्नि देवता परम ज्योति स्वरूप ॐकार की मात्राओं में ही स्थित रहते हैं ॥ ८५ ॥ इच्छा क्रिया तथा ज्ञानं ब्राह्मी रौद्री च वैष्णवी । त्रिधा मात्रा स्थितैर्यत्र तत्परं ज्योतिरोमति ॥८६ वचसा तज्जपेन्नित्यं वपुषा तत्समभ्यसेत् । मनसा तज्जपेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरोमति ॥८७ शुचिर्वाऽप्यशुचिर्वाऽपि यो जपेत्प्रणवं सदा । न स लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥८८ चले वाते चलो बिन्दुर्निश्चले भवेत् । योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥८९ यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवो न मुञ्चति । मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥६० क्रिया, इच्छा और ज्ञान ये तीन शक्तियां, ब्राह्मी, रौद्री और वैष्णवी ये तीन मात्रायें परम ज्योति रूप ॐकार में स्थित हैं ॥ ८६ ॥ उसे वाणी से सदैव जपे शरीर से सदैव उसका अभ्यास ( आचरण ) करे, मन से उसका सदैव जप करे, वही परम ज्योति स्वरूप ॐकार है ॥ ८७ ॥ शुद्ध अथवा अशुद्ध अवस्था में भी जो सदैव ॐकार का जाप करता करता है, वह पाप में लिप्त नहीं