BharatKosha
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

Page 93 of 572

Read in context
Page 93

योगचूड़ामणि उपनिषद् [ ८५ होता और संसार में कमल पत्रवत् रहता है ॥८८॥ वायु के चलित होने पर बिन्दु भी चलित होता है और वायु के निश्चल रहने पर वह भी स्थिर रहता है । बिन्दु की स्थिरता से योगी निश्चल होता है इस लिये वायु का निरोध करना ॥८६॥ जब तक देह में वायु स्थित है जब तक जीव उसे नहीं छोड़ सकता । वायु का निकल जाना ही मृत्यु है, इसलिये वायु का का निरोध करे ॥६०॥ यावद्बद्धो मरुत् देहे तावज्जीवो न मुञ्चति । यावद्दृष्टिभ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभय कुतः ॥६१॥ अल्पकालभयाद्ब्रह्मा प्राणायामपरो भवेत् । योगिनो मुनयश्चैव ततः प्राणान्निरोधयेत् ॥६२॥ षड्विंशदड्गुलीहंसः प्रायाणं कुरुते बहिः । वामदक्षिणमार्गेण धूणायामो विधीयते ॥६३॥ शुद्धिमेति यदा सर्वं नाड़ीचक्रं मलाकुलम् । तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणक्षमः ॥६४॥ बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत् । धारयेद्वा यथाशक्त्या भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥६५॥ जब तक देह में वायु स्थिर है तब तक जीव नहीं छूट सकता । जब तक दोनों भौंहों के बीच में दृष्टि स्थिर है तब तक काल का भय कहां ? ॥६१॥ काल से बचने के लिये ब्रह्मा भी प्राणायाम परायण होते हैं, इसलिये योगियों और मुनियों को चाहिये कि प्राण के निरोध का अभ्यास करें ॥६२॥ हंस (श्वास) छब्बीस अंगुल बाहर जाता है। बायें और दाहिने मार्ग से प्राणायाम किया जाता है ॥६३॥ जब नाड़ीचक्र सब प्रकार के मलों से शुद्ध हो जाता है, तब योगी प्राणों के निरोध में समर्थ होता है ॥ ६४ ॥ योगी को बद्ध पद्मासन लगाकर चन्द्र (बायीं नासिका) से वायु को खींचना