BharatKosha
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

Page 94 of 572

Read in context
Page 94

८६ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri और उसे यथाशक्ति भीतर रोककर सूर्य (दाहिनी नासिका) से बाहर निकालना ॥६५॥ अमृतोदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम् । ध्यात्वा चन्द्रमसं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६६॥ स्फुरत्प्रज्वलसज्जवालापूज्यमादित्यमण्डलम् । ध्यात्वा हृदि स्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत् ॥६७॥ प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यथा रेचयेत् । पीत्वा पिङ्गया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद्वामया । सूर्यचन्दमसोरनेन विधिना बिन्दुद्वयं ध्यायतः शुद्धा न डिगणा भवन्ति यमिनो मासद्वयादूर्ध्वतः ॥६८॥ यथेष्ट धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् । नादाभिव्यक्तिररोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥६९॥ प्राणो देहस्थितो यावदपानं तु निरुन्धयेत् । एकाश्वसमयी मात्रा ऊर्ध्वाधो गगने स्थितिः ॥१००॥ अमृत के समुद्र के समान, गो के दूध के सदृश धवल चन्द्रमा के विम्ब का ध्यान करता हुआ प्राणायाम करे ॥ ६६ ॥ फिर प्रज्ज्वलित ज्वाला के समान हृदय में स्थित सूर्य भगवान का ध्यान करते हुये प्राणायाम करे ॥ ६७ ॥ पहले इड़ा (बांयीं) नाड़ी से श्वास लेकर पिङ्गला दाहिनी से रेचक करे, फिर पिङ्गला से श्वास लेकर इड़ा से बाहर निकाल दे। इस प्रकार सूर्य और चन्द्र दोनों बिन्दुओं का ध्यान (अभ्यास) करने से दो मास में नाड़ी शुद्ध हो जाती है ॥ ६८ ॥ वायु का यथेष्ठ धारण करना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, नाद का सुनाई पड़ना, आरोग्य—ये सब नाड़ी शोधन से प्राप्त होते हैं ॥६९॥ जब तक देह में प्राणवायु स्थित है तब तक अपान को रोके। एक श्वास वाली मात्रा हृदयाकाश में ऊपर और नीचे गतिमान होती है ॥१००॥