BharatKosha
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

Page 15 of 540

Read in context
Page 15

( ९ )

सम्राट् हर्षवर्द्धन (६०६-६४७ ई०) के दरबार के महाकवि बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित की प्रस्तावना में कालिदास की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है और पुलकेशी द्वितीय (६३४ ई०) के ऐहोल नामक ग्राम में प्राप्त शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति में भी कालिदास को स्पष्ट उल्लेख है। इससे इसके बाद भी कालिदास नहीं हो सकते। अतः कालिदास का समय ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी के बीच कहीं न कहीं होना चाहिए। इन दो सीमाओं के आधार पर कालिदास की स्थिति के सम्बन्ध में विभिन्न ऐतिहासिक विद्वानों ने तीन मत प्रस्तुत किये हैं, क्योंकि कालिदास ने तो अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है और अपनी प्रतिभा के प्रकाश से विश्व को आलोकित करने वाले इस महाकवि ने अपना उल्लेख करना आवश्यक नहीं समझा। अपने स्थान और समय की बात को लिखना वे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं समझते थे। अतिरिक्त इससे दूसरी बात यह है कि उन्हें यह आशा न थी कि मेरी कृतियों को लेकर कभी इतिहास के भव्य भवन का निर्माण होगा। यही कारण है कि अन्य मनीषियों के समान कालिदास ने भी अपने निवास स्थान, समय तथा अपने आश्रयदाता के विवरण को नहीं प्रस्तुत किया।

कालिदास के समय के सम्बन्ध में प्रधानरूप से तीन मत उपस्थित होते हैं :— १—कालिदास षष्ठ शताब्दी के महाकवि हैं। २—कालिदास गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में हुए थे। ३—कालिदास की सत्ता ई० पू० प्रथम शताब्दी मानना आवश्यक है।

(१) प्रथम मत—इतिहास में विक्रम उपाधिधारी चार राजाओं का उल्लेख पाया जाता है जिनके समसामयिक होने के कारण कालिदास का समय विभिन्न शताब्दियों में मानना पड़ता है।

डॉ० हार्नली मानते हैं कि यशोधर्मन ने वलादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से कारूर के युद्ध में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकुल को हराकर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की और अपने इस बड़े विजय के उपलक्ष्य में विक्रम नाम का एक नया संवत् चलाया। इसे प्राचीन सिद्ध करने की इच्छा से उसने इसे ६०० छः सौ वर्ष पहले से ही प्रचारित किया। कालिदास इन्हीं के सभापण्डित थे। अतः कालिदास का समय छठी शताब्दी है। यह नई कल्पना डॉ० फर्गुसन साहब के मस्तिष्क की उपज है। कालिदास के समय निरूपण के लिए डॉ० हार्नली ने भी इसका उपयोग करते हुए यह दिखलाया है कि यशोधर्मन की राज्य सीमा रघु के दिग्विजय-प्रसंग में वर्णित राज्यसीमा से बिल्कुल मिलती-जुलती है। और एक आलोचक ने कुमारसम्भव की देवस्तुति के सांख्यसिद्धान्त को छठी शताब्दी में लिखी गई ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका के आधार पर अवलम्बित मानकर उसके आशय ग्रहण करनेवाले कालिदास का समय भी छठी शताब्दी माना है। म० म० हरिप्रसाद शास्त्री ने कौतुकपूर्ण अनेक युक्तियों से यह सिद्ध करने प्रयास किया है कि कालिदास भारवि के बाद छठी शताब्दी में हुए थे। मैक्समूलर का भी यही मत है कि कालिदास छठी शताब्दी में उत्पन्न हुए थे क्योंकि उसी समय भारतवर्ष में संस्कृत विद्या का पुनरुज्जीवन हुआ था। साहित्य, कला, विज्ञान आदि की दृष्टि से उत्तम युग था इसमें पुराणों का अन्तिम संस्करण और वैदिक धर्म का प्रचार हुआ था ऐसे समय पर इनका होना ज्यादा संभव है।

समीक्षा—हूणों को पराजित करनेवाले यशोधर्मन हूणारि कहे जा सकते हैं शकारि नहीं। छठी शताब्दी में शकों का कहीं नाम तक नहीं मिलता और न उनके शिलालेखों में