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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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( १० )

कहीं विक्रम सम्वत् स्थापना की चर्चा है। ६ सौ वर्ष पहले से यशोधर्मन द्वारा विक्रम की स्थापना भी इतिहास प्रसिद्ध है कि मालव सम्वत् के नाम से यह सम्वत् चला आता था, विक्रमादित्य ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में इसका नाम विक्रम सम्वत् रख दिया। दूसरी बात यह है कि मन्दसौर (मध्यभारत) के ई० ४७३ के शिलालेख में कुमारगुप्त की प्रशस्ति के लेखक वत्सभट्टि कवि ने कालिदास के मेघदूत और ऋतुसंहार के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। इसलिए कालिदास को पञ्चम शताब्दी के बाद मानना अप्रमाणिक और इतिहास विरुद्ध है।

( २ ) दूसरा मत—बहुत से विद्वानों ने सर्वतः समृद्ध शान्तिमय गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानी है। इनमें भी पूना के प्रोफेसर के० पी० पाठक का मत है कालिदास स्कन्दगुप्त के समकालीन थे। क्योंकि रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित महाराज रघु के दिग्विजय से स्कन्दगुप्त की विजय में अधिक समानता है। किन्तु डॉ० स्मिथ, कील, मैकडोनल डॉ० रामकृष्ण भण्डारकर, पं० रामावतार शर्मा और बहुसंख्यक पाश्चात्त्य विद्वान् मानते हैं कि कालिदास के आश्रयदाता गुप्तनरेशों में सबसे अधिक प्रभाव-शाली चन्द्रगुप्त द्वितीय थे। क्योंकि शकों को भारत से बाहर निकाल देने वाले विक्रमादित्य पदवीधारी चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्यकाल में सब तरह से शान्ति थी और भारतीय कला कौशल की उन्नति परम सीमा तक पहुँच गई थी। कालिदास के ग्रन्थों के समान गम्भीर विचार के ग्रन्थ ऐसे ही शान्तिमय समय में स्थिर चित्त से लिखे जा सकते हैं एवं रघुवंश के छठे सर्ग में वर्णित शान्ति का समुचित समय चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही समय था—

यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्थं पथे गतानाम्।

इसके अतिरिक्त इन्दुमती के स्वयम्बर में सम्मिलित मगधराज के लिए चन्द्रमा की जो उपमा दी गई उसमें चन्द्रगुप्त नाम का ही संकेत है।

कामं नृपाः सन्तु सहस्रशोऽन्ये राजन्वतीमाहुरनेन भूमिम्। नक्षत्र-तारा-ग्रहसंकुलापि ज्योतिष्मती चन्द्रमसैव रात्रिः॥ ६।२३

समीक्षा—मेघदूत का भूगोल गुप्तकाल के भूगोल से समता रखता है। गुप्तकाल के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानना भी ठीक नहीं क्योंकि केवल चन्द्रगुप्त द्वितीय ही विक्रमादित्य नहीं थे, किन्तु इनसे पूर्व मालवा में राज्य करने वाले विक्रमादित्य का पता इतिहास को मालूम है। दूसरी बात यह है कि यदि कालिदास गुप्तकाल में होते तो प्रयाग के स्कन्दगुप्त के स्तम्भ पर कालिदास की रचना न होकर साधारण पण्डित हरिसेन से क्यों लिखवाया जाता। इसलिए कालिदास को गुप्तकाल में मानना सर्वथा असंगत है।

( ३ ) तीसरा मत—उपर्युक्त कल्पनाओं से असन्तुष्ट होकर कुछ विद्वानों ने ६८ इसवी की गाथासप्तशती के पद्य में दानशील राजा विक्रमादित्य के स्पष्ट उल्लेख मिलने के आधार पर ईसा के पूर्व विक्रमादित्य की सत्ता प्रामाणिक रूप से स्थिर मानी है। इसके शकारि होने में भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है क्योंकि ईसा से १५० वर्ष पूर्व भारत में आने वाले शकों का पता इतिहास में मिलता है। अतः इन्हीं की सभा में कालिदास की सत्ता मानना युक्तियुक्त एवं प्रामाणिक प्रतीत होता है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग के ५९ वें श्लोक—'अथोरगाख्यस्य पुरस्य नाथं' में पाण्ड्यनरेश का वर्णन करते हुए कालिदास ने उरगपुर की उनकी राजधानी बतलाया है। उरियापुर का ही संस्कृत रूप उरगपुर जान