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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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पता लगता है कि मृत बनिये की एक स्त्री—अयोध्या के सेठ की कन्या—गर्भवती है तब वे कहते हैं कि वह गर्भस्थ बालक अपने पिता के धन का मालिक है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार राजा दुष्यन्त संगीत और चित्रकला के अनुपम उपासक हैं। पञ्चम अंक के आरम्भ में वे रानी हंसपदिका के मधुर स्वर-संयोग को सुनकर विदूषक से भूरि-भूरि उसकी प्रशंसा करते हैं। उनकी चित्र निर्माण कला का निदर्शन षष्ठ अङ्क में है। उन्होंने शकुन्तला का चित्र स्वयं बनाया था, जिसकी चित्रकारी पर विदूषक तथा सानुमती अप्सरा दोनों मुग्ध हैं—

अहो, एषा राजर्षेर्निपुणता। जाने सख्यग्रतो मे वर्तते।

राजा दुष्यन्त अपने मुँह अपनी तारीफ नहीं करते। जब वे दुर्जयदानवों को पराजित कर तथा इन्द्र से सत्कृत हो लौटते समय मातलि मार्ग में उनकी तारीफ करता है तब वे कहते हैं कि जो कुछ मैंने किया उसका श्रेय मुझको मत दीजिए, वह सब देवराज इन्द्र के प्रभाव का फल है।

दुष्यन्त लम्पट नायक नहीं हैं। यदि वे लम्पट होते तो पञ्चम अङ्क में आत्मसमर्पण करने के निमित्त स्वयं उपस्थित शकुन्तला को राजमहल में दाखिल कर लेते, किन्तु उनकी मनोवृत्ति यह है कि परस्त्री को ध्यान से देखना उचित नहीं है—'अनिर्वर्णनीयं परकलत्रम्।' 'अनार्यः परदारव्यवहारः।' इस अवसर पर उनकी दृढता उनके नैतिक चरित्र को बहुत ऊँचा उठा देती है।

जब गौतमी राजा को याद दिलाने के लिए शकुन्तला का अवगुण्ठन हटाती है तब उसका सौन्दर्य देखकर राजा चकित हो जाता है। तो भी अधर्म के भय से वह उसे स्वीकार करने के लिए उद्यत नहीं होता।

इनकी दृष्टि बड़ी सूक्ष्म है जब ये शिकार खेलते हुए कुलपति कण्व के तपोवन के पास पहुंचते हैं तो झट समझ जाते हैं कि यह तपोवन का भूभाग है। भय से भगाते हुए मृग-का वर्णन, तथा तपोवन के आभोग का वर्णन आदि इनकी सूक्ष्म दृष्टि के परिचायक हैं।

इस प्रकार दुष्यन्त प्रजा संरक्षण में सदा सन्नद्ध रहने वाला अपने समय का एक अप्रतिम धनुर्धर, धार्मिक, तेजस्वी एवं महाप्रतापी राजा हैं—

का कथा बाणसन्धाने ज्याशब्देनैव दूरतः।
हुङ्कारेणेव धनुषः स हि विघ्नानपोहति ॥ ३।१

वस्तुतः कविताकामिनी के विलास कविवर कालिदास ने अपने इस धीरोदात्त नायक राजा दुष्यन्त को बहुत सोच विचार कर प्रस्तुत किया है, इनको सफल शासक के सभी गुणों से अलङ्कृत किया है। ये कर्तव्यनिष्ठ, प्रजावत्सल, निर्लोभी, निर्भय, सहृदय, पराक्रमी, विनीत एवं आत्मप्रशंसा से रहित परमोत्साही व्यक्ति के रूप में अङ्कित किये गये हैं। इनकी जितनी महिमा गाई जाय थोड़ी है।

शकुन्तला

निसर्गसुन्दरी शकुन्तला अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की मुग्धा नायिका है और कुलपति कण्व की पालिता पुत्री है। इसकी माता मेनका अप्सरा है तथा पिता राजर्षि विश्वा-मित्र हैं इसका प्रसंग इस प्रकार है। एक बार विश्वामित्र मुनि तप में रम रहे थे। उनके उग्रतप से इन्द्र घबड़ा उठे। उन्होंने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए देवसुन्दरी

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