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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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मेनका अप्सरा को भेजा। एक तो मेनका का त्रिलोकविलक्षण सौन्दर्य पर्याप्त था ही, दूसरी ओर बसन्त का आविर्भाव और मादक बन गया। मेनका के अनुपम हाव-भाव, नृत्य-गीत, चाल ढाल आदि से सम्बलित बसन्त के झोंके से विश्वामित्र जी अपने को बचा न सके। उसे देखते ही वे मुग्ध हो गये उनका मन विचलित हो उठा, तप की गाढ़ी कमाई धूल में मिल गई। परिणामतः मेनका के मिलन से शकुन्तला का जन्म हुआ। मेनका उसे वही छोड़ कर स्वर्ग चली गई और विश्वामित्र आँख मूँद कर पुनः तपस्या में लीन हो गये किन्तु दयालु शकुन्त (पक्षियों) ने उस नवजात शिशु का पालन-पोषण करना प्रारम्भ किया। मालिनी नदी में स्नान करने के लिए जाते हुए महर्षि कण्व की उस पर दृष्टि पड़ी। उसे वे आश्रम में लाये और लालन पालन करने लगे। इस प्रकार शकुन्तला विश्वामित्र-मेनका की कन्या तथा महर्षि कण्व की पोष्य पुत्री है।

शकुन्तला कुलपति कण्व के पावन आश्रम में पलती और बढ़ती है। आश्रम का वातावरण शान्त है अवस्था के साथ-साथ शकुन्तला का शारीरिक सौन्दर्य भी निखर जाता है। वह शैशव, एवं किशोरावस्था को पार कर प्रौढ़ा हो गयी है उसका अनुपम सौन्दर्य बनावटी नहीं स्वाभाविक है। एक दिन हस्तिनापुर का चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कण्व के तपोवन में जा पहुँचते हैं जहाँ वह अनुपम सुन्दरी एवं सुकुमारी शकुन्तला को देखकर मुग्ध हो जाते हैं समान रूप और अवस्था वाली दो सखियों के साथ छोटे बड़े से वृक्षों को सींचते हुए देखकर राजा अपने मन में सोचते हैं—आश्रम के कार्यों में इसे लगाना ऋषि की विवेकहीनता है।

इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः तपःक्षमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया समीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति ॥ १।१६

वस्तुतः शकुन्तला का शरीर सुकुमारलता की भाँति कोमल है, उसका अधर किसलय के समान लाल है, उसकी बाहें लता शाखा के तुल्य मृदु हैं और उसके शरीर पर लुभावना यौवन प्रस्फुटित हो गया है, जिसका संकेत हँसाती हुई प्रियम्वदा उस समय करती है—जब शकुन्तला अनसूया से कहती है कि सखि ! प्रियम्वदा के द्वारा कसकर बाँधी हुई मेरी चोली को जरा ढोली कर दो। तब प्रियम्वदा उपालम्भपूर्वक कहती है—

इसके लिए तुम अपने स्तनों को विशाल बना देने वाली युवावस्था को उलाहना दो मुझे क्यों दोषी बना रही हो—अत्र पयोधरविस्तारयितृ आत्मनो यौवनमुपालभस्व, मां किमुपालभसे ? इससे प्रतीत होता है कि उसके अवयव व्यक्त हो गये हैं। संभवतः वह श्याम वर्ण की है। तृतीय अङ्क में राजा कहता है—हे सुन्दरी ! तुम्हारे श्याम वर्ण के सुन्दर हाथ में सौन्दर्य पाने के लिए चन्द्रमा मृणाल रूप से विद्यमान प्रतीत होता है—अयं स ते श्यामलतामनोहरम् । वह स्त्री रूप से विधाता की विलक्षण सृष्टि है—स्त्रीरत्न-सृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे । उसका रूप न सूँघा गया प्रसून है, नखक्षतविहीन कोमल किसलय है, न विंधा हुआ रत्न है, अनास्वादित अभिनव मधु है और अखण्डित पुण्यों का फल है। इसीसे दुष्यन्त जैसा चक्रवर्ती राजा कण्वाश्रम की ललामभूता शकुन्तला का दर्शन नेत्र का फल मानता है, उसे ही भूमण्डल की दर्शनीय वस्तु समझता है और विदूषक से स्पष्ट कहता है—माधव्य ! अनवाप्तचक्षः फलोऽसि, येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम् । शकुन्तला का पालन-पोषण तपस्वियों के बीच में हुआ है। अतः उसका जीवन तापसकन्या जैसा हो गया है। वह वल्कल पहनती है और शृङ्गार चेष्टाओं से अनभिज्ञ है।