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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

DevanagariSanskritpublished540 pages

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बिलखती हुई शकुन्तला को गृहिणी के कर्त्तव्य का उपदेश देते हैं कि श्वसुरगृह में जो लोग बड़े हों उनकी यथाविधि सेवा करना, सौतों के साथ सहेलियों जैसा व्यवहार करना, कभी किसी कारणवश पति अपमान करे तो उससे झगड़ना मत, सेवकों के साथ उदारता का व्यवहार करना, और सम्पत्ति के समय भोगों में आसक्त होकर अहंकार नहीं करना, इस प्रकार का व्यवहार करने वाली कुल-वधुएँ अनायास ही गृहिणीपद प्राप्त कर लेती हैं तथा प्रतिकूल चलने वाली स्त्रियाँ कुल के दुःख का कारण बनती हैं। शकुन्तला अपने साथ सखियों से चलने का आग्रह करती है पर महर्षि कण्व अनसूया और प्रियंवदा को शकुन्तला के साथ नहीं भेजते, क्योंकि उनका भी विवाह करना है। वे युवती कुमारी कन्याओं को विवाहिता कन्या के साथ उसके ससुराल भेजना उचित नहीं समझते, क्योंकि यह भारतीय परम्परा एवं मर्यादा के प्रतिकूल अव्यावहारिक कार्य है—वत्से ! इमे अपि प्रदेये, न युक्तमनयोस्तत्र गन्तुम्, त्वया सह गौतमी यास्यति। यह कह कर बड़ी बुद्धिमानी से शकुन्तला के आग्रह को टाल देते हैं।

वे कन्या को धरोहर समझते हैं। और उसके भार का सँभालना वे बड़ी सतर्कता तथा योग्यता का काम मानते हैं। कण्व जी शकुन्तला को अपने पति के घर भेजकर अपनी अन्तरात्मा में विशदता का अनुभव करते हैं।

अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः।
जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ॥ ४।२२

पति के घर जाने को उद्यत शकुन्तला जब महर्षि कण्व के गले में लिपट कर कहती है कि पिता जी ! आपकी गोद से बिछुड़ी हुई मैं मलय पर्वत से उखाड़ी गई चन्दनलता की भाँति दूसरे देश में कैसे जीवन को धारण कर सकूँगी ? तब कण्व जी बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से उसकी व्यग्रता को दूर करते हुए समझाते हैं बेटा ! तुम अतिकुलीन पति के प्रशंसनीय गृहिणी पद पर स्थित होकर उसके ऐश्वर्य कार्यों में हमेशा व्यस्त रहोगी और शीघ्र ही जिस प्रकार पूर्व दिशा पावन सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार पवित्र चक्रवर्ती पुत्र को पैदा कर मेरे विरहजन्य शोक को भूल जाओगी। अतः घबड़ाओ मत, स्वस्थ चित्त से पति के घर जाओ। कण्व जी के मतानुसार दुःख का सबसे उत्तम औषध समय-यापन है। कुछ समय बीतने पर दुःख अपने आप कम हो जाता है।

परिवार के किसी व्यक्ति के परदेश चले जाने पर घर के लोगों को अपना घर सूना लगने लगता है। इसका कारण प्रेम होता है। कुछ दिनों के बाद विरह भूल जाता है और मन धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाता है। इस रहस्य से कण्व खूब परिचित हैं। शकुन्तला के चले जाने से बाद प्रियम्वदा और अनसूया महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! हमलोग शकुन्तला से शून्य इस तपोवन में कैसे प्रवेश करें—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः। इस पर महर्षि कण्व कहते हैं—प्रेम के कारण ऐसा अनुभव हो रहा है, चलो कुछ दिनों के बाद सब ठीक हो जायेगा। इस प्रकार महर्षि कण्व का विशुद्ध जीवन गंगा के प्रवाह के समान परम पवित्र है, हिमालय की भांति उज्ज्वल है, समुद्र के समान गम्भीर तथा त्रिवेणी की तरह तरल है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी ही है।

कण्व की शिक्षा में भारतीय धर्म की मर्यादा बोल उठी है। कवि की वर्णाश्रम धर्म के प्रति आस्था तथा कौटुम्बिक कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता का सुन्दर प्रतिपादन इस प्रसंग में

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