अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
by महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
Page 73 of 540
Read in context( ६७ )
सम्पन्न हुआ है। सम्पूर्ण अङ्क में स्नेह और सौहार्द की जो पवित्र मन्दाकिनी प्रवाहित हुई है उससे वस्तुतः हमारी संस्कृति के सनातन सन्देश प्रतिध्वनित होते हैं।
विदूषक
अभिज्ञानशाकुन्तल के विदूषक का नाम माढव्य है। विदूषक हास्यरस का पात्र है वह वेश, वाणी आदि के द्वारा राजा का मनोविनोद करता है। यह जाति का बकवादी ब्राह्मण है और खूब खब्बू है, क्योंकि बीच-बीच में इसे लड्डू खाने की याद आती रहती है। यह हाथ में हमेशा टेढ़ा ठण्डा लिए रहता है। यह स्वभाव से डरपोक है, राक्षसों के भय से यह शकुन्तला को देखने के लिए नहीं जाता। यह उम्र में राजा से छोटा प्रतीत होता है क्योंकि यह अपने को राजा का अनुज तथा युवराज कहता है। जिस समय राजा दुष्यन्त माताओं के उपवास व्रत का सन्देश सुनकर पुत्रकृत्य सम्पादन के लिए विदूषक को राजधानी भेजते हुए कहते हैं कि मित्र ! मेरी माँ तुझे भी पुत्र की तरह मानती है। अतः तुम जाकर मां के पुत्र के कार्य का सम्पादन करो, मैं तपोवन की रक्षा कार्य में लगा हूँ। उस समय विदूषक कहता है तब तो जिस प्रकार राजा के छोटे भाई को जाना चाहिए उस प्रकार मैं जाऊँगा—यथा राजानुजेन गन्तव्यं तथा गच्छामि। तेन हि युवराजोऽस्मीदानीं संवृत्तः।
विदूषक राजा का अन्तरङ्ग मित्र होता है। अतः राजा उससे रहस्य की गुप्त बातें भी बताते रहते हैं। अतः द्वितीय अङ्क में राजा दुष्यन्त शकुन्तला के साथ चल रहे प्रेम प्रसंग को एकमात्र विदूषक से ही कहते हैं। यह परिवार का विश्वसनीय व्यक्ति है। पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका को समझाने के लिए राजा इसी को भेजते हैं यद्यपि प्रेम के सभी कार्यों में यह राजा का आन्तर सहायक है फिर भी राजा इसे चपल ही समझते हैं। वे इसे राजधानी भेजते समय मन में विचारते हैं कि यह ब्राह्मण बालक बड़ा चञ्चल है, कहीं शकुन्तला विषयक मेरे अनुराग को अन्तःपुर की स्त्रियों से न कह दे। अतः अब मैं इस प्रकार कहता हूँ। (विदूषक का हाथ पकड़कर) मित्र ! ऋषियों के गौरव के कारण में आश्रम में जा रहा हूँ। वस्तुतः तापसकन्या शकुन्तला पर मेरी आसक्ति नहीं है—वयस्य ! ऋषिगौरवादाश्रमं गच्छामि। न खलु सत्यमेव तापसकन्यकायां ममाभिलाषः।
क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृगशावैः सममेधितो जनः।
परिहासविजल्पितं सखे ! परमार्थेन न गृह्यतां वचः॥ २।१८
मित्र ! देखो, भोगविलास में आसक्त कहाँ हम लोग तथा कहाँ मृग के बच्चों के साथ पली हुई कामवासना से विरत मुनिकन्या शकुन्तला। इसलिए हँसी में कही गई इस बात को तुम सही मत समझना। राजा की कही हुई इस बात को माधव्य सच्चा समझकर अपने मुख में ताला लगा लेता है। विदूषक राजा का मुंहलगा व्यक्ति है।
यह समय समय पर उससे खूब हँसी करता है। कभी कभी राजा की कमजोरी का लाभ उठाकर यह उसे बेवकूफ भी बनाता है जैसे षष्ठ अंक में चित्रपट पर अङ्कित शकुन्तला के चित्र को देखते समय यह भौंरे की बात इस प्रकार उठाता है कि राजा उसे सच्चा भौंरा समझ कर बहुत कुछ कह जाते हैं। अन्त यह उसे याद दिलाता है कि यह तो चित्र का भौंरा है—भो चित्रं खलु एतत्।
राजा के साथ माधव्य की मैत्री का अन्यलोग भी लाभ उठा लेते हैं, वे जानते हैं कि राजा के सामने भेद नहीं खोलेगा। द्वितीय अङ्क में राजा के साथ मृगया सम्बन्धी बातें करने