अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)
DevanagariHindipublished423 pages
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सर्ग १ ] सुन्दरकाण्ड २०७
| सभार्यो राघवो भ्रात्रा गमिष्यति महावनम् ।<br>तत्र सीतां महामायां रावणोऽपहरिष्यति ॥५०॥<br>पश्चाद्रामेण साचिव्यं सुग्रीवस्य भविष्यति ।<br>सुग्रीवो जानकीं द्रष्टुं वानरान्प्रेषयिष्यति ॥५१॥<br>तत्रैको वानरो रात्रावागमिष्यति तेऽन्तिकम् ।<br>त्वया च भर्त्सितः सोऽपि त्वां हनिष्यति मुष्टिना ५२<br>तेनाहता त्वं व्यथिता भविष्यसि यदानघे ।<br>तदैव रावणस्यान्तो भविष्यति न संशयः ॥५३॥<br>तस्मात्त्वया जिता लङ्का जितं सर्वं त्वयाऽनघ ।<br>रावणान्तःपुरवरे क्रीडाकाननमुत्तमम् ॥५४॥<br>तन्मध्येऽशोकवनिका दिव्यपादपसङ्कुला ।<br>अस्ति तस्यां महावृक्षः शिंशपानाम मध्यगः ॥५५॥<br>तत्रास्ते जानकी घोरराक्षसीभिः सुरक्षिता ।<br>दृष्ट्वैव गच्छ त्वरितं राघवाय निवेदय ॥५६॥<br>धन्याऽहमप्यद्य चिराय राघव-<br>स्मृतिर्ममासीद्भवपाशमोचिनी ।<br>तद्भक्तसङ्गोऽप्यतिदुर्लभो मम<br>प्रसीदतां दाशरथिः सदा हृदि ॥५७॥<br>उल्लङ्घितेऽम्बुधौ पवनात्मजेन<br>धरासुतायाश्च दशाननस्य ।<br>पुस्फोर वामाक्षि भुजश्च तीव्रं<br>रामस्य दक्षाङ्गमतीन्द्रियस्य ॥५८॥ | ॥ ४८-४९ ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित महावन (दण्डकारण्य) में जायेंगे। वहाँ महामायारूपिणी श्रीसीताजीको रावण हर ले जायगा ॥५०॥ तदनन्तर रामके साथ सुग्रीवकी मित्रता होगी और सुग्रीव जानकीजीकी खोजके लिये वानरोंको भेजेगा ॥ ५१ ॥ उनमेंसे एक वानर रात्रिके समय तेरे पास आयेगा । वह तुझसे तिरस्कृत होनेपर तेरे मुक्का मारेगा ॥ ५२ ॥ हे अनघे ! जिस समय तू उसके प्रहारसे व्याकुल हो जायगी उसी समय रावणका अन्त होगा—इसमें सन्देह नहीं ॥ ५३ ॥ अतः हे निष्पाप हनुमन् ! तुमने (मुझ) लंकाको जीत लिया तो सभीको जीत लिया । रावणके अन्तःपुरमें एक अत्युत्तम क्रीडावन है ॥ ५४ ॥ उसमें दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न एक अशोकवाटिका है । उसके बीचों-बीचमें एक अति विशाल शिंशपा (सीसमका) वृक्ष है ॥ ५५ ॥ श्रीजानकीजी वहींपर भयंकर राक्षसियों-के पहरेमें रहती हैं । तुम उनका दर्शन कर शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीको उनका समाचार सुनाओ ॥ ५६ ॥ आज बहुत दिनोंमें मुझे श्रीरामचन्द्रजीकी संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली स्मृति हुई है और उनके भक्तका अति दुर्लभ सङ्ग प्राप्त हुआ है । अतः आज मैं धन्य हूँ । मेरे हृदयमें विराजमान वे दशरथनन्दन राम मुझपर सदा प्रसन्न रहें ॥ ५७ ॥<br>पवननन्दन हनुमान्जीके समुद्र लाँघते ही पृथिवी-पुत्री श्रीसीताजी और रावणकी बाँयीं भुजा और बाँये नेत्र तथा इन्द्रियातीत श्रीरामचन्द्रजीके दाँये अंग बड़े जोरसे फड़कने लगे ॥ ५८ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥