अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २०८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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द्वितीय सर्ग
हनुमान्जीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना।
| श्रीमहादेव उवाच | |
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| ततो जगाम हनुमान् लङ्कां परमशोभनाम् ।<br>रात्रौ सूक्ष्मतनुर्भूत्वा बभ्राम परितः पुरीम् ॥ १ ॥<br>सीतान्वेषणकार्यार्थी प्रविवेश नृपालयम् ।<br>तत्र सर्वप्रदेशेषु विविच्य हनुमान्कपिः ॥ २ ॥<br>नापश्यज्जानकीं स्मृत्वा ततो लङ्काऽभिभाषितम् ।<br>जगाम हनुमान् शीघ्रमाशोकवनिकां शुभाम् ॥ ३ ॥<br>सुरपादपसम्बाधां रत्नसोपानवापिकाम् ।<br>नानापक्षिमृगाकीर्णां स्वर्णप्रासादशोभिताम् ॥ ४ ॥<br>फलैरानम्रशाखाग्रपादपैः परिवारिताम् ।<br>विचिन्वन् जानकीं तत्र प्रतिवृक्षं मरुत्सुतः ॥ ५ ॥<br>ददर्शाभ्रंलिहं तत्र चैत्यप्रासादमुत्तमम् ।<br>दृष्ट्वा विस्मयमापन्नो मणिस्तम्भशतान्वितम् ॥ ६ ॥<br>समतीत्य पुनर्गत्वा किञ्चिद्दूरं स मारुतिः ।<br>ददर्श शिंशपावृक्षमत्यन्तनिबिडच्छदम् ॥ ७ ॥<br>अदृष्टातपमाकीर्णं स्वर्णवर्णविहङ्गमम् ।<br>तन्मूले राक्षसीमध्ये स्थितां जनकनन्दिनीम् ॥ ८ ॥<br>ददर्श हनुमान् वीरो देवतामिव भूतले ॥<br>एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् ॥ ९ ॥<br>भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ।<br>त्रातारं नाधिगच्छन्तीमुपवासकृशां शुभाम् ॥१०॥ | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीहनुमान्जी अति सुशोभिता लंकापुरीमें गये और सूक्ष्म शरीर धारण कर रात्रिमें नगरमें सब ओर घूमते रहे ॥ १ ॥ सीताजीका पता लगानेके लिये वे राज-मन्दिरमें घुस गये, वहाँ सब ओर ढूँढ़नेपर भी जब उन्हें जानकीजी न मिलीं तो उन्हें लंकिनीका कथन याद आया और वे तुरन्त ही अति मनोज्ञ अशोकवाटिकामें पहुँचे ॥ २-३ ॥ वह वाटिका कल्पवृक्षोंसे पूर्ण थी, उसकी बावड़ियोंकी सीढ़ियाँ रत्नजटित थीं, उसमें नाना प्रकारके पक्षी और मृगगण विचर रहे थे तथा सुवर्ण-निर्मित महलोंकी अपूर्व शोभा थी ॥ ४ ॥ वह वाटिका फलोंके भारसे झुकी हुई शाखाओंवाले वृक्षोंसे घिरी हुई थी। वहाँ प्रत्येक वृक्षके नीचे जानकीजीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पवननन्दन हनुमान्जीने एक अति सुन्दर देवालय देखा। वह इतना ऊँचा था कि उसके शिखर बादलोंसे टकराते थे। सैकड़ों मणिमय स्तम्भोंसे युक्त उस देवालयको देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५-६ ॥ उससे कुछ और आगे बढ़े तो उन्होंने एक अत्यन्त घने पत्तोंवाला शिंशपा (सीसमका) वृक्ष देखा ॥७॥ उसके नीचे धूप कभी नहीं जाती थी और वह सुनहरी पक्षियोंसे आकीर्ण था। वीरवर हनुमान्जीने देखा कि उस वृक्षके नीचे श्रीजानकीजी पृथिवीपर स्थित देवताके समान राक्षसियोंसे घिरी हुई बैठी हैं। उनके बालोंकी जुड़कर एक वेणी हो गयी है, वे अत्यन्त दुर्बल और दीन-अवस्था में हैं तथा मैले-कुचैले वस्त्र धारण किये हुए हैं ॥ ८-९ ॥ ऐसी अवस्थामें पृथिवीपर पड़ी हुई वे अति शोकपूर्वक 'राम-राम' कह रही हैं उन्हें अपना कोई रक्षक भी दिखायी नहीं देता और वे उपवास करनेसे अति दुर्बल हो गयी हैं ॥ १० ॥ |
| शाखान्तच्छदमध्यस्थो ददर्श कपिकुञ्जरः ।<br>कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं दृष्ट्वा जनकनन्दिनीम् ॥११॥<br>मयैव साधितं कार्यं रामस्य परमात्मनः ।<br>ततः किलकिलाशब्दो बभूवान्तःपुराद्बहिः ॥१२॥ | कपिश्रेष्ठ श्रीहनुमान्जी शाखाओंके पत्तोंमें छिपकर उन्हें देखने लगे और मन-ही-मन कहनेलगे कि 'आज जानकीजीको देखकर मैं कृतार्थ हो गया, कृतार्थ हो गया ! अहा ! परमात्मा रामका कार्य मेरे ही द्वारा सिद्ध हुआ।' इसी समय अन्तःपुरमेंसे बड़े किलकिला शब्दकी आवाज आयी ॥ ११-१२ ॥ तब हनुमान्जीने यह |