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अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

by महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल)

DevanagariHindipublished423 pages

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अध्यात्मरामायण

अयोध्याकाण्ड


प्रथम सर्ग

भगवान् रामके पास नारदजीका आना ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले-
एकदा सुखमासीनं रामं स्वान्तःपुराजिरे ।<br>सर्वाभरणसंपन्नं रत्नसिंहासने स्थितम् ॥ १ ॥हे पार्वति ! एक दिन जब सर्वाङ्कारविभूषित श्रीरामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके आँगनमें एक रत्नसिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥ १ ॥
नीलोत्पलदलश्यामं कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।<br>सीतया रत्नदण्डेन चामरेणाथ वीजितम् ॥ २ ॥तथा जिस समय नीलोत्पलदलश्याम कौस्तुभ-मणिमण्डित उन रघुनाथजीपर श्रीसीताजी रत्नदण्ड-युक्त चँवर डुला रही थीं ॥ २ ॥
विनोदयन्तं ताम्बूलचर्वणादिभिरादरात् ।<br>नारदोऽवतरद्द्रष्टुमम्बराद्यत्र राघवः ॥ ३ ॥और वे आदरपूर्वक दिये हुए ताम्बूल-चर्वणादिसे आनन्दित हो रहे थे उसी समय उन्हें देखनेके लिये देवर्षि नारदजी आकाशसे उतरे ॥ ३ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशः शरच्चन्द्र इवामलः ।<br>अतर्कितमुपायातो नारदो दिव्यदर्शनः ॥ ४ ॥<br>तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय रामः प्रीत्या कृताञ्जलिः।<br>ननाम शिरसा भूमौ सीतया सह भक्तिमान् ॥ ५ ॥शुद्ध स्फटिक मणिके समान स्वच्छ और शरच्चन्द्रके समान निर्मल दिव्यमूर्ति श्रीनारदजीको इस प्रकार अचानक आते देख शक्तिशाली भगवान् राम सहसा उठ खड़े हुए और सीताजीके सहित प्रेम और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥
उवाच नारदं रामः प्रीत्या परमया युतः ।<br>संसारिणां मुनिश्रेष्ठ दुर्लभं तव दर्शनम् ।<br>अस्माकं विषयासक्तचेतसां नितरां मुने ॥ ६ ॥<br>अवाप्तं मे पूर्वजन्मकृतपुण्यमहोदयैः ।<br>संसारिणापि हि मुने लभ्यते सत्समागमः ॥ ७ ॥फिर भगवान् रामने परम प्रीतिपूर्वक नारदजीसे कहा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! हम-जैसे विषयासक्त संसारी मनुष्योंके लिये आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है । हे मुने ! आज अपने पूर्वजन्म-कृत पुण्य-पुञ्जके उदय होनेसे ही मुझे आपका दर्शन हुआ है, क्योंकि हे मुने ! पुण्योदय होनेपर संसारी पुरुषको भी सत्संग प्राप्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥
अतस्त्वद्दर्शनादेव कृतार्थोऽस्मि मुनीश्वर ।<br>किं कार्यं ते मया कार्यं ब्रूहि तत्करवाणि भोः॥ ८ ॥अतः हे मुनीश्वर ! आज आपके दर्शनसे ही मैं कृतार्थ हो गया, अब मुझे आपका क्या कार्य करना होगा सो कहिये, उसे मैं (इस समय) पूर्ण करूँ” ॥ ८ ॥