अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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४२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १]
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| अथ तं नारदोऽप्याह राघवं भक्तवत्सलम् ।<br>किं मोहयसि मां राम वाक्यैर्लोकानुसारिभिः ॥९॥<br>संसार्यहमिति प्रोक्तं सत्यमेतत्वया विभो ।<br>जगतामादिभूता या सा माया गृहिणी तव ॥१०॥<br>त्वत्सन्निकर्षाज्जायन्ते तस्यां ब्रह्मादयः प्रजाः ।<br>त्वदाज्ञया सदा भाति माया या त्रिगुणात्मिका ॥११॥<br>सूतेऽजस्रं शुक्लकृष्णलोहिताः सर्वदा प्रजाः ।<br>लोकत्रयमहागेहे गृहस्थस्त्वमुदाहृतः ॥१२॥<br>त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा ।<br>ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥१३॥<br>भवान् शशाङ्कः सीता तु रोहिणी शुभलक्षणा ।<br>शक्रस्त्वमेव पौलोमी सीता स्वाहाऽनलो भवान् ॥<br>यमस्त्वं कालरूपश्च सीता संयमिनी प्रभो ।<br>निर्ऋतिस्त्वं जगन्नाथ तामसी जानकी शुभा ॥१५॥<br>राम त्वमेव वरुणो भार्गवी जानकी शुभा ।<br>वायुस्त्वं राम सीता तु सदागतिरितीरिता ॥१६॥<br>कुबेरस्त्वं राम सीता सर्वसंपत्प्रकीर्तिता ।<br>रुद्राणी जानकी प्रोक्ता रुद्रस्त्वं लोकनाशकृत् ॥१७॥<br>लोके स्त्रीवाचकं यावत्तत्सर्वं जानकी शुभा ।<br>पुन्नामवाचकं यावत्तत्सर्वं त्वं हि राघव ॥१८॥<br>तस्माल्लोकत्रये देव युवाभ्यां नास्ति किञ्चन ॥१९॥<br>त्वदाभासोदिताज्ञानमव्याकृतमितीर्यते ।<br>तस्मान्महांस्ततः सूत्रं लिङ्गं सर्वात्मकं ततः ॥२०॥<br>अहङ्कारश्च बुद्धिश्च पञ्चप्राणेन्द्रियाणि च ।<br>लिङ्गमित्युच्यते प्राज्ञैर्जन्ममृत्युसुखादिमत् ॥२१॥<br>स एव जीवसंज्ञश्च लोके भाति जगन्मयः ।<br>अवाच्यानाद्यविद्यैव कारणोपाधिरुच्यते ॥२२॥ | तब नारदजीने भक्तवत्सल भगवान् रामसे कहा—"हे राम ! आप सामान्य मनुष्योंके-से इन वाक्योंसे मुझे क्यों मोहित कर रहे हैं ॥९॥ हे विभो ! आपने जो यह कहा कि 'मैं संसारी हूँ' सो ठीक ही है, क्योंकि सम्पूर्ण संसारकी जो आदि-कारण है वह माया आपकी गृहिणी है ॥१०॥ हे प्रभो ! आपकी सन्निधिमात्रसे ही उस मायासे ब्रह्मा आदि सब प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं, वह सत्त्व-रज-तमोमयी त्रिगुणात्मिका माया सदा आपके आश्रित होकर ही भानमान होती है तथा स्वगुणानुरूप शुक्ल, लोहित और कृष्णवर्ण प्रजा उत्पन्न करती है। इस त्रिलोकी-रूप महागृहके आप गृहस्थ कहे गये हैं ॥११-१२॥ आप भगवान् विष्णु हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं; आप शिव हैं और जानकीजी पार्वती हैं; आप ब्रह्मा हैं और जानकीजी सरस्वती हैं तथा आप सूर्यदेव हैं और जानकीजी प्रभा हैं ॥१३॥ आप चन्द्रमा हैं, शुभलक्षणा सीताजी रोहिणी हैं; आप इन्द्र हैं और सीता पुलोम-कन्या शची हैं तथा आप अग्नि हैं और सीताजी स्वाहा हैं ॥१४॥ हे प्रभो ! आप सबके कालरूप यम हैं और सीता संयमिनी हैं, हे जगन्नाथ ! आप निरृति हैं और जानकीजी तामसी हैं ॥१५॥ हे राम ! आप वरुण हैं और शुभलक्षणा जानकी भृगु-कन्या वारुणी हैं, आप वायु हैं तथा सीताजी सदागति हैं ॥१६॥ हे राम ! आप कुबेर हैं और सीताजी उनकी सब सम्पत्ति हैं तथा आप लोकसंहारकारी रुद्र हैं और सीताजी रुद्राणी कहलाती हैं ॥१७॥ हे राघव ! निःसन्देह संसारमें जो कुछ पुरुषवाचक है वह सब आप हैं और स्त्रीवाचक सब श्रीजानकीजी हैं; अतः हे देव ! त्रिलोकीमें आप दोनोंसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥१८-१९॥ आपहीके आभाससे प्रकट हुआ अज्ञान अव्याकृत कहलाता है, उससे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे सूत्रात्मा (हिरण्यगर्भ) और सूत्रात्मासे सर्वात्मक लिंगदेह उत्पन्न होता है ॥२०॥ अहंकार बुद्धि, पञ्चप्राण और दश इन्द्रियाँ—इनके समूहको ही प्राज्ञजन जन्म, मृत्यु और सुख-दुःखादि धर्मों-वाला लिङ्गदेह बताते हैं ॥२१॥ वह (लिंग-देहाभिमानी चेतनाभास) ही जगत्में तन्मय हुआ जीव नामसे विख्यात है। अनिर्वचनीय और अनादि |