ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपहला अध्याय १—यज्ञ द्वारा ही देव ऊँचे स्वर्ग लोक को गये। उनको भय हुआ कि हमारे इस ( यज्ञ ' को देखकर मनुष्य और ऋषि लोग पीछें से जिज्ञासा करेंगे। उन्होंने यूप ( यज्ञ शाला का खंभा जिसमें पशु बांधते हैं ) द्वारा उनको रोक दिया। ( आयोपयन् ) इसीलिये इसका नाम यूप पड़ा। ( यूप का अर्थ हुआ वह जिसके द्वारा रोका जाय )। उन ( देवों ) ने स्वर्ग जाते हुये यूप को भूमि में इस प्रकार गाड़ा कि सिरा नीचे को रहे। तब मनुष्य और ऋषि भी देवों के यज्ञ करने के स्थान पर आकर सोचने लगे कि हमको भी यज्ञ के विषय में कुछ ज्ञान हो जाय। उन्होंने केवल यूप को पृथ्वी में नीचे की ओर सिरा किये हुये गढ़ा पाया। उन्होंने जाना कि इसी से देवों ने यज्ञ के रहस्य को छिपा दिया। उन्होंने यूप को उखाड़ दिया और उसका सिरा ऊपर को कर दिया। इससे उन्होंने यज्ञ को मालूम किया और स्वर्ग को देख लिया। यही प्रयोजन है कि यूप का सिरा ऊपर को करके गाड़ते हैं कि यज्ञ को जानें और स्वर्ग को देखें। ( ८९ )