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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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प्रथम अध्याय ] १०१ कर देता है। इस विषय में कुछ लोगों का कहना है कि यज्ञ में राक्षसों का नाम भी न लेना चाहिये, कोई भी राक्षस क्यों न हो। यज्ञ राक्षसों से सर्वथा मुक्त होना चाहिये। इस पर कुछ लोगों का उत्तर है कि उनका नाम लेना चाहिये। जो जिसका अधिकारी है उसको उस भाग से जो वंचित कर देता है वह दण्डनीय होता है; यदि वह नहीं तो उसका पुत्र, यदि पुत्र नहीं तो उसका पोता। परन्तु यदि होता (राक्षसों का) नाम ले तो धीरे से ले। क्योंकि जो धीमी आवाज है वह भी छिपी हुई है और जो राक्षस हैं वह भी छिपे हुये हैं। यदि जोर से नाम लेगा तो उसकी आवाज राक्षसों की सी हो जायगी। जो कोई क्रोध में बोलता है या उन्मत्त होकर बोलता है उसकी राक्षसी बोली हो जाती है। जो इस रहस्य को समझता है वह न तो स्वयं क्रुद्ध होगा, न उसकी सन्तान में कोई ऐसा होगा। "उल्लू के समान आकृति वाली अंतड़ियों को न काटो ! हे वध करने वालो (शमितारः), और न तुम्हारे पुत्रों या सन्तान में कोई ऐसा हो जो इनको काटे।" ऐसा कह कर वह इन अंतड़ियों को वध करने वाले देवतों और वध करने वाले मनुष्यों को दे देता है। अब कहता है। "हे अध्रिगु ! मारो, अच्छी तरह मारो। हे अध्रिगु मारो।" अब तीन बार कहे "अपाप" (अर्थात् पाप न लगे ! अप ! अप ! दूर ! दूर !) देवों में अध्रिगु वह है जो 'शमिता' अर्थात् पशु को चुप करता है। और अपाप वह है जो उसे नीचे डालता है। इन शब्दों को कह कर वह पशु को उनके हवाले कर देता है जो उसे चुप करते हैं या जो इसका वध करते हैं। होता तब कहता है कि "हे वध करने वालो (शमितारः), जो कुछ भी सुकृत