ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१०२ [ दूसरी पञ्चिका अर्थात् पुण्यकर्म है वह इसमें रहे, और दुष्कृत है वह अन्यत्र चला जाय ।” इस वाचा से (अर्थात् इन शब्दों से) होता (पशु वध का) आदेश देता है, क्योंकि जब अग्नि देवताओं का होता था, तब उसने भी इन्हीं शब्दों से (पशु के) वध का आदेश दिया था । इन शब्दों से ही होता (समस्त दुष्परिणामों को) उनसे अलग कर देता है जो पशु का दम घोंटते हैं और जो उसका वध करते हैं और जो कई प्रकार से नियमों का उल्लंघन करते हैं, जैसे एक टुकड़े को अति शीघ्र काट डालना और दूसरे को अति विलम्ब से, अथवा एक टुकड़े को बहुत बड़ा काट डालना, और दूसरे को बहुत छोटा । इस प्रकार सुख प्राप्त करता हुआ होता अपने को (पापों से) मुक्त कर लेता है, और सर्वायु अर्थात् पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, पूर्णायु प्राप्ति के लिए (वह समर्थ होता है) । जो इस (रहस्य को) जानता है, वह पूर्णायु प्राप्त करता है । ८—देवताओं ने (यज्ञ के लिये) पुरुष पशु को प्राप्त किया (या मारा) । पर उसका वह अंश जो मेध बनने या आहुति के योग्य था, उसमें से निकल गया और घोड़े में प्रविष्ट हो गया । और तब घोड़ा मेध्य पशु बन गया । तब देवताओं ने पुरुष को निकाल दिया, क्योंकि उसमें से वह भाग निकल चुका था, जो मेध्य था, और जिसके निकल जाने पर वह “किंपुरुष” अर्थात् सर्वथा अयोग्य हो चुका था । देवताओं ने तब घोड़े को मारा, पर मेध उसमें से निकल कर गौ (गाय या बैल) के शरीर में पहुँच गया, और तब गौ मेध्य बन गई । देवताओं ने अश्व को निकाल दिया क्योंकि अश्व के शरीर में से वह अंश निकल गया था जिसके कारण