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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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प्रथम अध्याय ] १०३ वह मेध्य था और जिसके निकल जाने पर वह "गौरमृग" बन गया था। देवताओं ने तब गौ को मारा, पर गौ में से भी मेध निकल गया, और भेड़ के शरीर में प्रविष्ट हुआ, और तब भेड़ मेध्य बन गयी। जिस गाय में से मेध निकल चुका था उसको देवों ने निकाल दिया। और वह नील गाय बन गई। उन्होंने भेड़ को मार डाला। मरी हुई भेड़ में से मेध निकल कर बकरी में प्रविष्ट हुआ और बकरी मेध्य हो गई। जिस भेड़ में से मेध निकल चुका था उसे देवों ने निकाल दिया और वह ऊँट बन गई। बकरी में मेध बहुत दिनों तक रहा। इसलिये सब पशुओं में बकरी सब से अधिक बलि के योग्य है। उन्होंने बकरी को मारा। उस मरी हुई बकरी से मेध निकल कर पृथिवी में घुस गया। इसलिये पृथिवी बलि के योग्य हो गई। मरी हुई बकरी से जो मेध निकल गया तो देवों ने उसे निकाल दिया और वह शरभ बन गया। जिन पशुओं में से मेध निकल चुका वह अमेध्य हो गये। इसलिये उनका मांस न खाना चाहिये। जब मेध पृथिवी में चला गया, तो देवों ने उसे घेर लिया। वह चांवल (व्रीहि) हो गया। जब पशु के वध के पश्चात् पुरोडाश को बांटते हैं तो यह इच्छा करते हैं कि हमारी पशु- इष्टि मेधयुक्त हो। जो इस रहस्य को समझता है उसका पशु मेधयुक्त हो जाता है और उसमें इष्टि का पूर्ण रूप आ जाता है। (८) ९-(पशु-इष्टि में) जो पुरोडाश होता है वही मारा जाने वाला पशु है। चावल की जो किंशारु अर्थात् भूसी है वही पशु के लोम के तुल्य है। जो तुषा है वह खाल के। जो छोटे-छोटे कण हैं वह रुधिर के, चावल की पिट्ठी मांस के। जो कसार या कठोर भाग है वह हड्डियों के। जो चावल के पुरोडाश से