ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१३८ [ दूसरी पञ्चिका कोई होता को अनुवषट्कार करते देखे तो कहे कि तुमने प्राणों का क्रम बन्द कर दिया जो अन्यथा बन्द न होता और इसलिये तुम्हारा जीवन समाप्त हो जायगा। ऐसा सदा होता है। इसलिये दो देवताओं के सोमपात्रों पर अनुवषट्कार न पढ़े। इस पर कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब मित्र, वरुण सम्बन्धी पुरोहित दो बार आगू कहता है और दो बार याज्य मन्त्र पढ़ने की प्रेरणा करता है तो होता एक बार आगू कह कर दो बार वषट्कार क्यों बोलता है (आगू का अर्थ यह है कि पुरोहित कहता है "होता यक्षत" या "होतर्यज", यह वह दो बार कहता है। होता एक बार उत्तर देता है "ये ३ यजा- महे।" (प्रश्न यह है कि दो प्रश्नों का होता एक ही उत्तर क्यों देता है?) इसका उत्तर यह है कि दो देवताओं के सोम पात्र तो प्राण हैं और आगू वज्र है। इसलिये यदि होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू बोल दे तो वह वज्र से यजमान का जीवन काट दे। (यदि कोई होता को ऐसा करते देखे तो) कहे कि तूने यजमान के जीवन को आगू वज्र से काट कर अपना जीवन भी काट डाला। सदा ऐसा ही होता है। होता दो याज्य मन्त्रों के बीच में आगू न बोले। इसके अतिरिक्त मैत्रावरुण पुरोहित यज्ञ का मन है और होता वाणी है। मन से प्रेरित होकर ही वाणी बोलती है। जो मन से विरुद्ध वाणी बोलता है वह वाणी असुरों को प्यारी होती है, देवों को नहीं। होता का आगू मैत्रावरुण के पुरोहित के दोनों आगूओं के अन्तर्गत है। (४) २९—ऋतु याज प्राण हैं। जो ऋतु याज करते हैं अर्थात् जो ऋतुओं के लिये आहुतियाँ देते हैं वे यजमान को प्राण धारण कराते हैं। 'ऋतुना' शब्द से आरम्भ होते हुये ऋतुओं के छः मन्त्र बोल कर यजमान में प्राण धारण कराते हैं।