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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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चौथा अध्याय ] १३९ “ऋतुभिः” शब्द से आरम्भ होते हुये चार मन्त्रों से अपान को यजमान में धारण कराते हैं। पीछे के दो मन्त्र जो 'ऋतुना' से आरम्भ होते हैं उनसे यजमान में व्यान धारण कराते हैं। यह प्राण तीन तरह का है—प्राण, अपान, व्यान। यह जो "ऋतुना", "ऋतुभिः", "ऋतुना" आदि वाले मन्त्रों को निरन्तर पढ़ते हैं वह प्राणों के सिलसिले को जारी रखने के लिये। उनका खंडन न होने देने के लिये। ऋतुयाज प्राण हैं। उनके पीछे अनुवषट्- कार न कहे। ऋतुओं का कोई अन्त नहीं। एक के बाद दूसरी आती है। अगर वह ऋतुयाजों के पीछे अनुवषट्कार कहेगा तो रोक देगा। क्योंकि अनुवषट्कार विराम का सूचक है। जो इसको कहेगा वह ऋतुओं को रोक देगा और आपत्ति में पड़ेगा। सदा ऐसा ही होता है। इसलिये ऋतुयाज के मन्त्र बोलने के बाद अनुवषट्कार न कहे। (५) ३०—दो देवों वाले सोम पात्र प्राण हैं। और इला अर्थात् पुरोडाश पशु हैं। सोम पात्रों में से पीकर इला को बुलाता है। पशु ही भोजन है। इस प्रकार पशुओं को बुलाता है यजमान में पशुओं को धारण कराता है। यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले इला ( पुरोडाश ) को खावे या चमसे में से पान करे। इसका उत्तर यह है कि पहले भोजन कर ले, फिर सोम पान करे। दो देवतों के सोम ग्रह से उसने सोम पान पहले कर ही लिया। इसलिये अब पहले अपने हाथ का पुरोडाश खाले, फिर चमसे में से सोम पान करे। इस तरह से उसे दोनों तरह का अन्न अर्थात् खाना और पानी मिल जाता है। ( ग्रह और चमसा ) दोनों में से सोम पान करने से सब प्रकार का भोजन प्राप्त हो जाता है। दो देवतों के ग्रह प्राण हैं और होता का चमसा आत्मा है।