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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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१४० [ दूसरी पञ्चिका ग्रहों में से चमसे में सोमरस उँडेलने का तात्पर्य यह है कि होता अपने में प्राण धारण कर रहा है, और पूर्ण आयु को प्राप्त हो रहा है। जो इस भेद को समझता है वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है। (६) ३१—देवों ने जो यज्ञ किया वही असुरों ने किया। वे बराबर शक्ति वाले हो गये, और देवों के अधीन न रहे। तब देवों ने "तूष्णीं शंस" (चुपचाप प्रार्थना या जाप) को देखा। असुरों ने इसको न किया। यह जो चुपचाप की प्रार्थना है वह मन्त्रों का सार रूप है। देव जिस जिस वज्र को उठाते थे असुर उसको जान जाते थे। देवों ने अब "चुपचाप की प्रार्थना" को देखा और इसी वज्र को उठाया। असुर न जान सके। देवों ने इस वज्र का असुरों पर प्रहार किया। असुर न जान सके। इस प्रकार देव असुरों पर विजय पा गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु, अहितकर और अत्याचारी पर विजय पा लेता है। देवों ने अपने आपको विजयी समझ कर यज्ञ रोप दिया। असुर उसके निकट आये कि विघ्न डालें। उन्होंने बड़े असुरों को चारों ओर से आते देखा। तब उन्होंने कहा "इसे समाप्त कर दें जिससे असुर इसका विध्वंस न कर सकें।" उन्होंने ऐसा ही किया, "तूष्णीं शंस" अर्थात् चुपचाप प्रार्थना द्वारा उसको समाप्त किया। उन्होंने "भूरग्निज्योतिरग्निः" से आज्य और प्रउग को समाप्त किया है। "इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः" से उन्होंने निष्केवल्य और मरुत्वती को समाप्त किया। "सूर्यो- ज्योतिर्ज्योतिः स्वःसूर्यः" से वैश्वदेव और अग्निमारुत को समाप्त किया। (आज्य और प्रउग प्रातःकाल की प्रार्थनायें हैं। निष्केवल्य और मरुत्वती दोपहर की। तथा वैश्वदेव और अग्नि- मारुत शाम की)।