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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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१४६ [ दूसरी पञ्चिका अब वह कहता है :- "ऋतूर्तों होता" "अपराजित होता" । यह अग्नि अपराजित होता है। क्योंकि कोई इसका मुकाविला नहीं कर सकता। इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "तूर्णिर्हव्यवाट्" "हव्य को ले जाने वाले वाहक" । हव्यों को ले जाने वाला वाहक वायु है। क्योंकि वायु सारे संसार में शीघ्रता से बहता है। वह हवियों को देवों तक ले जाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य पाता है। अब वह कहता है :- "आ देवो देवान् वक्षत् ।" "देव देवों को लावें।" वह देव ( स्वर्गीय अग्नि ) है जो देवों को यहां लाता है। इस प्रकार वह उस लोक में उस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "यक्षादग्निर्देवो देवान् ।" "अग्नि देव देवों के प्रति मन्त्र बोले।" देवों के प्रति मन्त्र बोलने वाला यह अग्नि है। इस प्रकार वह इस लोक में अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "सो अध्वराकरति जातवेदाः ।" "वह जातवेद पवित्र आहुति को बनावे।"