ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपांचवाँ अध्याय ] १४७ वायु ही जातवेद है। वायु ही इस सब संसार को बनाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है। (निविद् के यह बारह पद हुये) । (२) ३५—अब होता इन अनुष्टुभ् मन्त्रों को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै । गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥ ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः । हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः । अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मखम् ॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा । यतो नः प्रुष्णवद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः । ऋक्ववाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥ उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । श नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥ (ऋ० ३।१३।१-७) वह पहले पद को अलग करता है। क्योंकि स्त्री अपनी जांघों को अलग करती है। वह अन्तिम पदों को जोड़ता है। क्योंकि पुरुष जांघों को मिलाता है। यह मैथुन है। वह आज्य मंत्र को पढ़ने के आरम्भ में संतान-प्रजनन के लिये मैथुन करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है। इस सूक्त को पढ़ते हुये पहले पदों को अलग करने से वज्र के पिछले भाग को मोटा कर देता है। और अन्तिम भागों को