ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१५२ [ दूसरी पञ्चिका दैवी क्षत्रिय से प्रेरित होकर होता शस्त्र पढ़ता है। यह दोनों (बृहस्पति और सोम) समस्त जगत् या जो कुछ है उस पर शासन करते हैं। इन दोनों की प्रेरणा के बिना होता जो कुछ करता है वह न करने के बराबर है। जैसे कहा जाता है कि इसका किया बेकिया हो गया ! जो इस रहस्य को समझता है उसका सब किया हुआ सुकृत होता है, अकृत नहीं होता। अब कहता है :— “वागायुर्विश्वायुर्विश्वमायुः” आयु प्राण है। प्राण वीर्य है। वाणी योनि है। यह पढ़कर मानो वह योनि में वीर्य सींचता है। अब कहता है :— “क, इदं शंसिष्यति स इदं शंसिष्यति”। ‘कः’ प्रजापति है। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजा- पति उत्पन्न करेगा। (६) ३९—'आहाव' के बाद तूष्णी-शंस (“चुपचाप प्रार्थना”) कहता है। मानो सींचे हुये वीर्य में विकार उत्पन्न करता है। पहले वीर्य सींचा जाता है फिर उसमें विकार उत्पन्न होता है। 'तूष्णी-शंस' चुपके-चुपके होती है। वीर्य सिंचन भी चुपके- चुपके होता है। जैसे चुपके से तूष्णी-शंस कही जाती है उसी प्रकार चुपके से वीर्य भी विकृत होते हैं। वह 'तूष्णी-शंस' को छः पदों में (ठहर-ठहर कर) कहता है। पुरुष छः वाला है अर्थात् उसके छः अङ्ग होते हैं। इस प्रकार वह आत्मा को छः वाला अर्थात् छः अंगों वाला बना देता है। 'तूष्णी-शंस' को कह कर वह “पुरोरुक्” कहाता है। इस प्रकार वह विकृत वीर्य को जन्म देता है। पहले विकार होता है फिर जन्म। 'पुरोरुक्' को उच्च स्वर से कहता है। इस प्रकार वह इसको उच्च स्वर से जन्म देता है (अर्थात् बच्चा पैदा होते ही रोता है) !