ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 167 of 592
Read in contextपांचवाँ अध्याय ] १५३ 'पुरोरुक्' को बारह पदों में कहता है। बारह मास का संवत्सर होता है। संवत्सर प्रजापति है। वह सब सृष्टि को बनाता है। जो इस सब जगत् को उत्पन्न करता है वही यजमान को उत्पन्न करता है और वही उसको सन्तान और पशुओं से युक्त करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं से युक्त होता है। वह 'पुरोरुक्' को जातवेद के लिये पढ़ता है। जातवेद का नाम अंतिम पद में आता है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब जातवेद तीसरे सवन का देवता है तो प्रातः सवन में जातवेद के प्रति 'पुरोरुक' क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जातवेद प्राण हैं। जातवेद कहते हैं उसको जो उत्पन्न हुओं को जाने (जात = उत्पन्न हुआ; वेद = जाने)। जितने उत्पन्न हुओं को वह जानता है, उतने ही होते हैं। जिनको वह नहीं जानता वह कैसे हो सकते हैं? जिसने समझ लिया कि "आज्य शस्त्र" द्वारा मेरी आत्म- संस्कृति (आत्म-सुधार) हो गई वही ज्ञानी है। (७) ४०—अब वह इस आज्य सूक्त को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै। गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥१॥ शृतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः। हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥२॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः। अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मघम् ॥३॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा। यतो नः प्रुष्यावद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥४॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः। ऋक्वाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥५॥