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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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पाँचवाँ अध्याय ] १५५ “नूनो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” (ऋ० ३।१३।७) यह पढ़कर समाप्त करता है। आत्मा ही 'समस्त' है, सहस्रवान् है तोकवान् है, पुष्टिमान् है। इस को पढ़कर वह 'समस्त आत्मा' को उत्पन्न करता और समस्त आत्मा को सुसंस्कृत करता है। अब वह एक याज्य संत्र पढ़ता है। याज्य पूर्ति है। याज्य पुण्य है। याज्य लक्ष्मी है। इस प्रकार पुण्य लक्ष्मी को उत्पन्न करता है और उसका संस्कार करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त होकर देवताओं में मिल जाता है। जो जानता है कि मैं इस प्रकार छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त हो गया वही ज्ञानी है। यही अध्यात्म विद्या है। यही आधिदैवत विद्या है। (८) ४१—'तूष्णींशंस' को छः पदों में पढ़ता है। छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वह ६ ऋतुओं को बनाता और उन्हीं में प्रवेश करता है ! 'पुरोरुक्' को बारह पदों में पढ़ता है। बारह महीने होते हैं। इस प्रकार वह महीनों को बनाता और उनमें प्रवेश करता है। “प्रवो देवाय अग्नये” (ऋ० ३।१३।१) पढ़ता है। 'प्र' अन्तरिक्ष है। यह सब भूत अन्तरिक्ष में ही रहते हैं। वह अन्तरिक्ष को बनाता है और अन्तरिक्ष में प्रवेश करता है। “दीदिवांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) पढ़ता है। यह सूर्य ही 'दीदिव' या चमकने वाला है। इससे पूर्व कोई नहीं है। वह इस प्रकार सूर्य को बनाता है और सूर्य्य में ही प्रवेश करता है। “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४) पढ़ता है। अग्नि शर्माणि है। यही अन्न आदि को देती है। इस प्रकार अग्नि को ही बनाता है और उसी में प्रवेश करता है !