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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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१५६ [ दूसरी पञ्चिका “उतनो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६) पढ़ता है। चन्द्रमा ही ब्रह्म है, इस प्रकार चन्द्रमा को बनाता है और चन्द्रमा में ही प्रवेश करता है। “स यंता विप्र एषाम्” (३।१३।३) इसको पढ़ता है। वायु ही नियंता है। वायु से ही अन्तरिक्ष नियंत्रित है, और इधर उधर नहीं हो सकता। इसको पढ़कर वह वायु को बनाता और वायु में प्रवेश करता है। “ऋतावा यस्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) इसको पढ़ता है। द्यौ और पृथिवी रोदसी हैं। इस प्रकार वह द्यौ और पृथिवी को बनाता है और उन्हीं में प्रवेश करता है। “नूनो रास्वसहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” ( ३।१३।७ ) इसको पढ़ कर समाप्त करता है। संवत्सर ही ‘समस्त’ है “सहस्रवान्, तोकवान् और पुष्टिमान्” है। वह समस्त संवत्सर को बनाता है और उसी में प्रवेश करता है। “याज्य” पढ़ता है। वृष्टि याज्य है। विद्युत् ही याज्य है। क्योंकि विद्युत् ही वर्षा और अन्न को उत्पन्न करती है। इस प्रकार वह विद्युत् को बनाता और उसमें प्रवेश करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस सब से युक्त होकर देवतामय हो जाता है। (९) एतरेय ब्राह्मण की दूसरी पंचिका का पांचवां अध्याय समाप्त।