ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
Page 187 of 592
Read in contextदूसरा अध्याय १२—कहते हैं कि देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना होनी चाहिये । एक छन्द को दूसरे छन्द में रखना चाहिये । प्रातः सवन में होता तीन अक्षर का 'शोंसावोम्' कहता है और अध्वर्यु पांच अक्षर का “'शंसामोदैवोम्” कहता है । इस प्रकार आठ अक्षर हो जाते हैं। आठ अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार प्रातः सवन में पहले इसको गायत्री बना देते हैं। प्रातः सवन के अन्त में होता चार अक्षरों का “उक्थं वाचि" कहता है । इस पर अध्वर्यु चार अक्षरों का "ओमुक्थशः" कहता है । इस प्रकार प्रातः सवन के आरंभ और अन्त में गायत्री की कल्पना हो जाती है । दोपहर के सवन में होता छः अक्षरों का "अध्वर्योशोंसावोम्” कहता है । इस पर अध्वर्यु पांच अक्षरों का 'शंसामोदैवोम्' कहता है । इस प्रकार ग्यारह अक्षर हो जाते हैं । ग्यारह अक्षरं का त्रिष्टुभ् होता है । इस प्रकार दोपहर के सवन के पहले त्रिष्टुभू की कल्पना हो जाती है। सवन के अन्त में होता सात अक्षरों का "उक्थं वाचि इन्द्राय" कहता है । अध्वर्यु चार ( १७३ )