ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१७४ [ तीसरी पञ्चिका अक्षरों का “ओ३मुक्थाशाः” कहता है। यह ग्यारह अक्षर हो जाते हैं। ग्यारह अक्षरों का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार दोपहर के सवन के आरंभ और अन्त में त्रिष्टुभ् की कल्पना हो जाती है। तीसरे सवन के आरंभ में होता सात अक्षर का “अध्वर्योशो शोंसावोम्” कहता है। अध्वर्यु पांच अक्षर का “शंसामो दैवोम्” कहता है। यह बारह अक्षर हो जाते हैं। बारह अक्षर की जगती होती है। इस प्रकार तृतीय सवन के आदि में जगती छन्द की कल्पना हो जाती है। तृतीय सवन के अन्त में होता ग्यारह अक्षर का “उक्थं वाचि इन्द्राय देवेभ्यः”, अध्वर्यु एक अक्षर का ‘ओम्’ कहता है। इस प्रकार बारह अक्षर हो जाते हैं। बारह अक्षरों की जगती होती है। इस प्रकार तीसरे सवन के आरंभ और अन्त दोनों में जगती की कल्पना की जाती है। ऋषि ने इसको देखा और कहा :— यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्वा त्रैष्टुभं निरतक्षत। यद् वा जगज् जगत्याहितं पदं य इत्तद् विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥ (ऋ० १।१६४।२३) “जो गायत्री को गायत्री पर, रखना जानते हैं, जिनको ज्ञान है कि त्रिष्टुभ् से त्रिष्टुभ् निकलता है और जगती जगती में रक्खा जाता है वह अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।” इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह छन्द में छन्द को रखता है और देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना करता है। (१) १३—प्रजापति ने देवों के लिये यज्ञ और छन्दों के भाग अलग अलग कर दिये। उसने प्रातः सवन में अग्नि और वसुओं के लिये गायत्री छन्द दिया। दोपहर के सवन में इन्द्र