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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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दूसरा अध्याय ] १८५ करते हैं। वह हमारी याचना को पूरी करे" । ( 'प्रासहस्पति' का अर्थ है 'प्रासहा' का पति और शक्ति का पति ) । "यदीमुशमसि कर्तवे करत् तत्" का अर्थ है कि जो कुछ हम कहेंगे वह करेगा। ऐसा उसने कहा। देवों ने कहा, "इसमें उस रानी को भी भाग दो जिसे अब तक कोई भाग नहीं मिला"। उन्होंने ऐसा ही किया और एक भाग दिया। इस लिये ऊपर की ऋचा निष्केवल्य शस्त्र का भाग है। प्रासहा नाम की इन्द्र की वावाता प्यारी रानी सेना है। 'कः' नाम प्रजापति उस (स्त्री) का ससुर है। इसलिये यदि कोई चाहे कि उसकी सेना विजयी हो जाय तो युद्ध की सीमा के पार जाकर एक कुश ले और दोनों सिरे तोड़ कर शत्रु की ओर फेंक दे और यह कहे "प्रासहे कस्त्वा पश्यति" ( हे प्रासहा, तुझे कौन देखता है या तुझे प्रजापति देखता है। जो इस रहस्य को समझता है वह यदि अपनी सेना को जिताना चाहे तो एक तृण लेकर दोनों सिरे तोड़कर शत्रु पर फेंक दे और कहे "प्रासहे कस्त्वा पश्यति"। तो वह सेना छिन्न भिन्न हो जायगी जैसे ससुर के सामने आते ही पुत्र-वधू शरमा जाती है। इन्द्र ने उन देवों से कहा, "इस शस्त्र में आपको भी भाग मिलेगा'। देवों ने कहा "निष्केवल्यशस्त्र में विराट् छंद में आज्य शस्त्र हमारा भाग हो"। विराट् में तैंतीस अक्षर होते हैं। देव भी तैंतीस होते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा- पति और वषट्कार। देवता अक्षर अक्षर बाँट लेते हैं और अक्षर अक्षर करके देवपात्र से पीते और संतुष्ट होते हैं। यदि कोई होता चाहे कि यजमान को घर से वंचित कर दे तो विराट् छंद में आज्य न पढ़े, किसी और छंद अर्थात् गायत्री