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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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१८६ [ तीसरी पञ्चिका या त्रिष्टुभ् में पढ़े। और यजमान घर आदि से वंचित रह जायगा। यदि होता यजमान को घर से मुक्त करना चाहे तो विराट् छन्द के नीचे के मंत्र से याज्य पढ़े और उसे अवश्य घर की प्राप्ति हो जायगी :— पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्य्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा ॥ (११) ( ऋ० ७।२२।१ ) २३—पहले ऋक् और साम अलग अलग थे। 'सा' ऋक् था “अमः” साम था। 'सा' जो ऋक् थी उसने 'अमः' नाम के साम से कहा “हम दोनों एक दूसरे के साथ प्रसंग करें कि सन्तान हो जाय।” साम ने कहा, “नहीं, मेरी महिमा बड़ी है।” तब ऋक् दो हो गईं और उन्होंने साम से वही बात कही। उसने नहीं माना। तब ऋक् तीन हो गईं। तीनों वही बोलीं। इस प्रकार साम तीनों ऋचाओं से मिल गया। इसलिये तीन ऋचाओं को पढ़ते हैं, और तीन ऋचाओं से आरंभ करते हैं। इसीलिये एक आदमी के कई स्त्रियां होती हैं और एक स्त्री के कई पति नहीं होते। 'सा' और 'अमः' से मिलकर साम बन गया। जो इस रहस्य को समझता है वह सामन या न्यायवाला हो जाता है। जो बड़े पद को प्राप्त होता है उसे साम कहते हैं और जो न्याय-शून्य होता है उसे असामन्य कहते हैं। यह निंदा वाचक है। वे दोनों अर्थात् साम और ऋक् पाँच पाँच भाग करके बनाये गये। (१) आहव और हिंकार, (२) प्रस्ताव और पहली ऋचा, (३) उद्गीथ और दूसरी ऋचा, (४) प्रतिहार और तीसरी ऋचा (५) निधन और वषट्कार। यह हुये पांच भाग। इसीलिये कहते हैं कि यज्ञ पांच भाग वाला है। पशु पांच भाग वाले हैं (४ पैर और एक मुँह)।