ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] १८७ ऋक् और साम दोनों में पांच पांच भाग हैं। यह विराट् के अन्तर्गत हैं) क्योंकि विराट् के दश भाग होते हैं। इसलिये कहते हैं कि यज्ञ दस भाग वाले विराट् में स्थापित है। स्तोत्रिय आत्मा है। अनुरूप प्रजा है, धय्या पत्नी है। पशु प्रगाथ हैं। और सूक्त घर हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इस लोक और परलोक दोनों में प्रजा और पशुओं के साथ अपने घरों में रहता है। (१२) २४—वह स्तोत्रिय को कहता है। स्तोत्रिय आत्मा है। वह मध्यम आवाज से कहता है। इससे वह अपने लिये आत्मा को बना लेता है। वह अनुरूप को कहता है। अनुरूप प्रजा है। उसको उच्च स्वर से पढ़ना चाहिये। उससे वह अपनी सन्तान को अपनी अपेक्षा अधिक सुखी बनाता है। वह धाय्या को पढ़ता है। धाय्या स्त्री है। धाय्या को बहुत नीचे स्वर से पढ़ना चाहिये। जो उस रहस्य को समझकर धाय्या को बहुत नीचे स्वर से पढ़ता है उसकी स्त्री घर में उससे अप्रिय नहीं बोलती। वह प्रगाथ को बोलता है। इसको स्वर सहित पढ़ना चाहिये। पशु ही स्वर हैं। पशु ही प्रगाथ हैं। वह पशुओं की प्राप्ति के लिये है। अब वह इस सूक्त को पढ़ता है :— इन्द्रस्य नु वीर्याणि—इत्यादि (ऋ० १।३२।१-१५) यह निष्केवल्य शस्त्र का सूक्त इन्द्र को प्रिय है। इसका ऋषि हिरण्यस्तूप है। इस सूक्त से आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ने इन्द्र को प्रसन्न किया और परम धाम को पाया जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र को प्रसन्न करता और परमधाम को प्राप्त होता है।