ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context६ [ ऐतरेय-ब्राह्मण की गणना वेदों में नहीं है। इस विषय पर पूर्वकाल में ही बहुत शास्त्रार्थ हुये हैं और अब भी होते रहते हैं। मेरी राय में तो यह झगड़ा 'वेद' शब्द के अर्थों से सम्बन्ध रखता है। यदि वेद का अर्थ सामान्य ज्ञान है तो ब्राह्मण ग्रन्थ क्या अन्य शास्त्र और वैज्ञानिक पुस्तकें भी वेद माननी पड़ेंगी। परन्तु यदि वेद वह अपौरुषेय ज्ञान है जो आदि सृष्टि में ईश्वर की ओर से अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा के हृदयों में आविर्भूत हुआ और जिसको वैदिक साहित्य में स्वतः प्रमाण माना गया है तो ऋग्, यजुः, साम और अथर्व मन्त्र संहिताओं को ही वेद माना जा सकता है अन्य ग्रन्थों को नहीं। इसके लिये बाल की खाल निकालने की आवश्यकता नहीं। केवल ब्राह्मणों के पाठ मात्र से ही सिद्ध हो जाता है कि यह वेद नहीं। यदि कोई अपने किसी विशेष ग्रन्थ में परिभाषा के रूप में यह मान ले तो वह मान सकता है। जैसे कानून की पुस्तकों में उल्लेख होता है कि जहाँ कहीं 'नर' शब्द आया हो तो वहाँ उससे 'नारी' का भी तात्पर्य है। जब कहते हैं कि मनुष्य को सच बोलना चाहिये तो स्त्री और पुरुष दोनों से तात्पर्य है, एक से नहीं। “जो कोई चोरी करेगा वह दण्डनीय होगा” का अर्थ यह भी है कि 'जो कोई स्त्री चोरी करेगी वह दण्डनीय होगी।" इसका अर्थ नहीं कि पुरुष का अर्थ स्त्री है या स्त्री का पुरुष। न हर स्थान पर यह परिभाषा काम आ सकती है। पुरुष पच्चीस वर्ष की आयु में विवाह करे। यहाँ 'पुरुष' में स्त्री की गणना नहीं होती। इसी प्रकार यदि आपस्तम्ब और कात्यायन ने अपने ग्रन्थों में विशेष परिभाषा बनाने के लिये यह कह दिया कि मंत्रब्राह्मणयोर्वेदनाम धेयम् ( आप० २४।१।३१, कात्यायन १।१ ), तो इतना कहने से ब्राह्मण वेद नहीं हो गये। इसका केवल यह अर्थ हुआ कि उन विशेष ग्रन्थों में यह परिभाषा प्रयुक्त हुई