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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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. प्राक्कथन ] ७ है। कात्यायन का यह सूत्र बनाना ही प्रकट करता है कि इससे पहले ब्राह्मण ग्रन्थों की गणना 'वेद' में नहीं थी। संक्षेप के हेतु यह परिभाषा बना ली गई। यदि वेद और ब्राह्मण एक होते तो यह परिभाषा न बनाई जाती। जैसे यदि सामान्यतया पुरुष का अर्थ स्त्री होता तो कानून में उपर्युक्त परिभाषा न बनाई जाती। यतः स्त्री पुरुष नहीं है, अतः यह परिभाषा बनाई गई कि जहाँ- जहाँ पुरुष का उल्लेख हो वहाँ स्त्री का भी समावेश समझा जाय। कभी-कभी वेद शब्द शास्त्र मात्र के अर्थ में भी आया है, जैसे धनुर्वेद, गन्धर्व वेद इत्यादि। परन्तु यह वेद नहीं है। जब ब्राह्मणों की आन्तरिक साक्षी स्पष्टतया उनको उस अर्थ में वेद नहीं दर्शाती जिसमें ऋग्, यजुः आदि अपौरुषेय माने गये हैं तो यदि एक सहस्र पुस्तकों में वेद और ब्राह्मण को एक माना हो तो भी यही कहना पड़ेगा कि यह उल्लेख परिभाषा के लिये ही है। प्रत्येक ग्रन्थकार को परिभाषा बनाने का अधिकार है। परन्तु उससे किसी शब्द के वास्तविक अर्थों में भेद नहीं पड़ता। कुछ लोग ब्राह्मणों को वेद सिद्ध करने के लिये वेदों को भी खटाई में डाल देते हैं। कोई कहता है कि वेद अनन्त हैं, इसलिये ब्राह्मण वेद हैं। कोई कहता है कि बहुत से ब्राह्मण ग्रन्थ लुप्त हो गये। कोई 'वेद' की व्युत्पत्ति करके ब्राह्मणों को वेद सिद्ध करना चाहता है। वह यह नहीं समझते कि इससे ब्राह्मणों का गौरव तो नहीं होता परन्तु वेदों का लाघव हो जाता है। क्योंकि ब्राह्मण ग्रन्थ की आन्तरिक साक्षी ( Internal Evidence ) ही उनको अन्यथा सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है। मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त। अब एक प्रश्न रह जाता है। क्या ब्राह्मण ग्रन्थों में कोई बात वेद विरुद्ध भी है ? ब्राह्मण ग्रन्थ जैसे इस समय मिलते हैं उनसे तो कई बातों में वेद-विरोध स्पष्ट ही है। जैसे यज्ञों में पशु-