ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय ] १९१ सब सवनों में यह पहला और मुख्य होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसे श्रेष्ठता मिलती है। जो बायें पैर से पकड़ा था वह दोपहर का सवन् हुआ। यह फिसल पड़ा और फिसलने के कारण यह प्रातःसवन के °पद को न पा सका। देवों को मालूम हो गया। उन्होंने चाहा कि यह व्यर्थ न जाये। इसलिये उन्होंने छन्दों में से त्रिष्टुभ् को इस में रख दिया। और देवों में से इन्द्र को। इसलिये उसमें भी उतना ही बल आ गया जितना पहले सवन में था। जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों सवनों से सुख लाभ करता है क्योंकि वह समान वीर्य वाले और गुण वाले हैं। जिसको गायत्री मुख में लाई थी वह तीसरा सवन हुआ। नीचे को उड़ते हुये मार्ग में गायत्री ने इस भाग का रस चूस लिया। इसलिये यह पहले दोनों सवनों की अपेक्षा नीरस हो गया। देवों को ज्ञात हो गया और उन्होंने चाहा कि वह नष्ट न हो। तब उन्होंने ढूँढा, तब उसको पशुओं में पाया। इसलिये ऋत्विज् लोग शाम के सवन में दूध की आहुति देते हैं, और पशु का याज्य देते हैं। इससे वह सवन पहले सवनों के बराबर हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब सवनों द्वारा सुखी होता है जो तुल्य गुण वाले और तुल्य शक्ति वाले है। (३) २८—दोनों छन्दों ने गायत्री से कहा, “तू जो हमारे अक्षर ले आई है उनको दे दे।” गायत्री बोली, “नहीं।” उन्होंने कहा, “वे हमारी सम्पत्ति हैं।” उन्होंने देवों से पूछा। देवों ने कहा, “हां, वे तुम्हारी सम्पत्ति हैं।” इसी के अनुकरण में लोग कहते हैं, “यह चीज़ हमारी सम्पत्ति है।” इस प्रकार गायत्री के आठ अक्षर हो गये। त्रिष्टुभ् के तीन और जगती के एक !