ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१९० [ तीसरी पञ्चिका दक्षिणा दोपहर के सवन में होती हैं जो त्रिष्टुभ् का सदन है। क्योंकि त्रिष्टुभ् ही तो उसे लाई थी। (१) २५—तब देवों ने कहा, "गायत्री, तू इस सोम राजा को ला।" उसने कहा, "अच्छा, लेकिन तुम सब मेरे जाने और लौट आने के लिये स्वस्ति बोलते रहना।" उन्होंने कहा, "अच्छा"। वह उड़ी और ये सब "प्र च च" स्वस्ति कहते रहे। इसलिये यदि कोई अपना प्यारा यात्रा करने जाये तो उसके आराम से जाने और आराम से लौटने के लिये 'प्र च च' ऐसा स्वस्ति वचन बोलना चाहिये। तो वह आराम से जायगा और आराम से लौट आवेगा। गायत्री ने ऊपर जाकर सोम के संरक्षकों को डरा दिया और सोम को अपने पैरों और चोंच से पकड़ लिया। और उन अक्षरों को भी जो दो पहले छन्द छोड़ आये थे। सोम के पालक कृशानु ने एक तीर छोड़ा और उस के बाँयें पैर का नाखून गिर गया। वह नाखून शल्यक् (सेही) हो गया। नाखून से जो वशा या चर्बी गिरी वह वशा (बकरी) हो गई। इसलिये वशा हवि के तुल्य है। तीर की जो नौक थी वह न काटने वाला सर्प (निर्दंशी) हो गयी। और जिस बल से तीर छोड़ा गया उससे स्वज नामी सर्प हुआ। जो पंख थे उनसे (अश्वत्थ की) हिलनेवाली शाखायें। स्नायु अर्थात् नसों से गंडूपद (केंचुए) कीड़े। तीर के तेज से अंधाहि (अंधा सांप) उत्पन्न हुआ (कृशानु के) तीर का यह हाल हुआ। (२) ३६—गायत्री ने जिस भाग को सीधे पैर से पकड़ा वह प्रातः सवन हुआ। गायत्री ने उसको अपना स्थान बना लिया। तभी से प्रातः सवन सब से अच्छा समझा जाता है। और