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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२०४ [ तीसरी पञ्चिका अवर, पर, मध्यम इन सोम्य पितरों को बुलाकर वह सब पितरों को प्रसन्न करता है, किसी को छोड़ता नहीं । दूसरे मंत्र में 'बर्हिषद्' से तात्पर्य यह है कि उनका प्रिय धाम है। इस को पढ़ कर वह प्रिय घास के द्वारा उनको प्रसन्न करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम के द्वारा फूलता फलता है। "पितरों के नमस्कार" वाला मंत्र अन्त में पढ़ता है। इस लिये अन्त में पितरों को नमस्कार होता है "पितृभ्यो नमः"। यहां प्रश्न होता है कि इसके पहले आहाव अर्थात् 'शोंसावोम्' कहना चाहिये या मंत्र को बिना आहाव के पढ़ना चाहिये ? 'आहाव' के साथ पढ़ना चाहिये। पितृयज्ञ में जो बात अधूरी रह गई है उसे पूरा करना है। 'आहाव' पढ़ने से अधूरी क्रिया पूरी हो जाती है। इसलिये 'आहाव' पढ़ना आवश्यक है। (१३) ३८—अब इन्द्र के अनुपान के मंत्रों को पढ़ता है :-- स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्। उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु ॥१॥ अयं स्वादुरिहमदिष्ट आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद । पुरुणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्योहन् ॥२॥ अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः । अयं षडुर्वीर- मिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥३॥ अयं स यो वरिमार्णं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः । अयं पीयूपं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्वन्तरिक्षम् ॥४॥ ( ६।४७।१-४) इन्हीं से इन्द्र ने तीसरे सवन के बाद सोम का अनुपान किया था। इसलिये यह अनुपानीय मंत्र कहलाते हैं। जब होता इन मंत्रों को पढ़ता है तो मानो देवता उस समय अनुपान करके प्रसन्न होते हैं। जब होता 'आहाव' कहता है तो अध्वर्यु 'मद्' धातु से निकला हुआ शब्द बोलता है।