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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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तीसरा अध्याय ] २०५ अब विष्णु और वरुण की ऋचा को पढ़ता है :- ययो रोजसा स्कभिता रजांसि वीर्यैर्भिर्वीरतमा । शविष्ठया पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतौ ॥ ֎ "वे दो जिन्होंने अन्तरिक्ष बनाया, जो बहुत बलवान और पराक्रमशील हैं, जो बिना किसी रोक टोक के राज करते हैं ऐसे विष्णु और वरुण पहले बुलावे पर आवें।" विष्णु यज्ञ के दोषों को दूर करता है और वरुण ठीक-ठीक यज्ञ के फल पर आधिपत्य रखता है। यह दोनों को शान्त करने के लिये है। अब वह विष्णु की ऋचा बोलता है :- विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥ (ऋ० १।१५४।१) विष्णु यज्ञ में मति के तुल्य है। जैसे किसान कृषि की भूल चूक को ठीक करता है, या जैसे राजा न्याय दरबार की भूल चूक को ठीक करता है, ऐसे ही होता इस मंत्र को पढ़ कर यज्ञ की भूल चूक को ठीक करता है। अब वह प्रजापति के इस मंत्र को पढ़ता है :- तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् । अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ॥ (ऋ० १०।५३।६) इसको पढ़ कर होता यजमान के लिये सन्तान को तानता है। 'ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धियाकृतान्' यहाँ प्रकाशयुक्त मार्गों से तात्पर्य "देवयानों" का है। इन्हीं को वह यजमान के लिये ठीक करता है। ֎ पता नहीं कि यह मंत्र कहाँ का है।

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