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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२०६ [ तीसरी पञ्चिका “अनुल्बणं वयत” इत्यादि “अर्थात् उपासकों के लिये तानो। मनु हो और दिव्य सन्तान (दैव्य जन) उत्पन्न करो।” ऐसा कह कर वह मानवी सन्तान से उसे सम्पन्न करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से सम्पन्न होता है। इस नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :- एवा न इन्द्रो मघवा विरप्शी करत् सत्या चर्षणी धृदनर्वा। त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे॥ (ऋ० ४।१७।२०) यह पृथ्‍वी ही “इन्द्र मघवा विरप्शी” (बहुत सी कारीगरी वाला मज़बूते इन्द्र) है। वह ‘सत्या’ है। वही “चर्षणी धृत्” (मनुष्यों को रखने वाली), अनर्वा (बेखटके) है। वही राजा है। ‘श्रवो माहिनं यज्जरित्रे’ में ‘माहिनं’ का अर्थ है पृथ्‍वी। ‘श्रवः’ है यज्ञ और ‘जरित्र’ है यजमान। इससे वह यजमान के लिये आशीर्वाद चाहता है। समाप्ति के समय पृथ्‍वी को छुये जिस पर यज्ञ करता है। इस पृथ्‍वी पर तो यज्ञ स्थापित होता है। अग्नि-मारुतीय शस्त्र को पढ़ कर याज्या पढ़ता है :- अग्ने मरुद्भिः शुभयद् भिर्ऋक्वभिः सोमं पिव मन्दसानो गण- भिभिः। पावकेभिर्विश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर प्रदिवा केतुना सजूः॥ (ऋ० ५।६०।८) इस प्रकार वह सब देवतों को भाग दे दे कर प्रसन्न करता है। (१४) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।

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