ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context२१६ [ तीसरी पञ्चिका के तुल्य है। क्योंकि ऐसी नियुक्ति से यजमान का भला नहीं होता। अगर कोई ऋत्विज् को डर के मारे नियुक्त करता है कि (अगर मैं इसे न नियुक्त करूंगा तो) यह मुझे मार डालेगा या मेरे यज्ञ में विघ्न डालेगा तो यह यज्ञ को निगल जाने के समान है। क्योंकि इससे यजमान को लाभ नहीं होता। वमन वह कि किसी ऐसे को ऋत्विज् वर लिया जिसकी कीर्ति ठीक नहीं है। जैसे वमन से लोग घृणा करते हैं ऐसे ही ऐसे मनुष्य से देव घृणा करते हैं। यह ऐसा ही घृणित कार्य है जैसा वमन। क्योंकि ऐसे के काम से यजमान का भला नहीं होता। इसलिये यजमान को चाहिये कि इन तीनों में से किसी को ऋत्विज् न बनावे। यदि भूल से इस प्रकार हो जाय तो इस का प्रायश्चित्त वामदेव्य गान है। क्योंकि यह वामदेव्य यजमान लोक, अमृतलोक और स्वर्गलोक है। इस साम में तीन अक्षर कम हैं। इसको पढ़ने के समय 'पुरुष' शब्द के जो आत्मा का पर्याय है, तीन टुकड़े करदे और हर एक को मंत्र के हर पाद के पीछे लगा दे। इस प्रकार वह अपने को यजमान लोक, अमृत लोक, और स्वर्गलोक में स्थापित कर लेता है। इस प्रकार यज्ञ के करने में जो भूल चूक हो जाती है उसकी निवृत्ति हो जाती है। ऋषि (ऐतरेय) का कहना है कि यदि ऋत्विज् समृद्ध (ठीक ठीक) भी हो तो भी वामदेव्य गान☸ करना चाहिये। (२) ☸वामदेव्य गान के तीन मन्त्र हैं:— ( १ ) कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता ॥