ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपाँचवाँ अध्याय ] २१७ ४७—देवों के लिये हव्य ढोते ढोते छन्द थक गये और यज्ञ के पिछले भाग में ठहर गये जैसे घोड़ा या खच्चर बोझ लेजाने के बाद थक कर ठहर जाता है । ( इनको ताज़ा करने के लिये ) मित्र और वरुण के पशु के लिये पुरोडाश देने के पश्चात् देविका हवियों को दे । धाता के लिये १२ कपालों का पुरोडाश । धाता वषट्कार है । अनुमति के लिये चरु । क्योंकि अनुमति गायत्री है । राका के लिये चरु । क्योंकि राका त्रिष्टुभ् है । सिनीवाली के लिये चरु । क्योंकि सिनीवाली जगती है । कुहू के लिये चरु क्योंकि कुहू अनुष्टुभ् है । यह सब छन्द हैं । क्योंकि अन्य छन्द भी गायत्री, त्रिष्टुभ्, जगती और अनुष्टुभ् के ही अनुयायी हैं । यह इस यज्ञ में श्रेष्ठ समझे जाते हैं । जो कोई इस रहस्य को समझ कर इन छन्दों से आहुति देता है मानों वह सभी छन्दों से आहुति देता है । कहावत है कि कि घोड़े यदि ठीक तौर पर रक्खे जांय तो सवार को आराम मिलता है । यही हाल छन्दों का है । छन्दों को ठीक तौर पर रक्खा जाय तो यजमान को लाभ पहुचाते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह उस लोक को प्राप्त होता है जिसका उसने कभी ध्यान भी नहीं किया । ( २ ) कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः । दृढा चिदारुजे वसु ॥ ( ३ ) अभीषुणः सखीनामविता जरितॄणाम् । शतमभवास्त्यूतये ॥ ( साम० १।३।१-२,-३ ) यह गायत्री छन्द में हैं । इनमें से तीसरे मंत्र में २१ ही अक्षर हैं । तीन कम हैं । इसलिये पहले पद के अन्त में 'पु', दूसरे के 'रु' और तीसरे के 'ष' लगाकर छन्द पूरा कर दिया जाता है ।