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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२२६ [ चौथी पञ्चिका प्रश्न होता है कि यह षोडशी नाम क्यों पड़ा । स्तोत्र १६ होते हैं । शस्त्र भी सोलह होते हैं । सोलह अक्षर ( अनुष्टु॒भ् ) के बाद ठहरता है और सोलह अक्षर के बाद 'ओ३म्' कहता है । इसमें १६ पदों का निविद् रक्खा जाता है । इसीलिये षोडशी नाम पड़ा । अब दो अक्षर बढ़े ( मंत्र के पिछले भाग में १६ के बजाय अठारह अक्षर होते हैं । ) क्योंकि षोडशी के अनुष्टुभ् में अठा- रह अक्षर हैं । यह वाणी के दो स्तन रूप हैं जो इस रहस्य को समझता है उसकी सत्य रक्षा करता है और झूठ उसको हानि नहीं पहुँचाने पाता । (१) २--तेज और ब्रह्मवर्चस् का इच्छुक षोडशी में गौरिवीत साम का पाठ करे । ( गौरिवीत साम-इन्द्र जुषस्व प्रवहाय··· साम वेद, उत्तरार्चिक ३।२२; आश्वलायन श्रौत सूत्र ६।२ ) । यह गौरिवीत साम तेज भी है और ब्रह्मवर्चस् भी । जो इस रहस्य को समझ कर गौरिवीत साम पढ़ता है वह तेजस्वी और ब्रह्म- वर्चस्वी होता है । कुछ लोग कहते हैं कि षोडशी में नानद साम पढ़ना चाहिये, ( नानद साम—प्रत्यस्मै पिपीषते इत्यादि, सामवेद ४।२।७।१-४ ) इन्द्र ने वृत्र के लियें वज्र उठाया, और उसे मारा, और उसे घायल किया । घायल होकर वह शोर करने लगा ( व्यनदत् ) । इसलिये नानद साम हो गया । इसीलिये इसको नानद साम कहते हैं । नानद साम को शत्रु का भय नहीं क्योंकि यह शत्रु का मारने वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर षोडशी में नानद साम का पाठ करता है उसका शत्रु मर जाता है और वह शत्रुओं से अभय हो जाता है । यदि नानद साम पढ़ा जाय तो अविहृत पढ़ना चाहिये (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से नहीं मिलाने