ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextपहला अध्याय ] २२७ चाहिये) क्योंकि इसको अविहृत ही पढ़ा जाता है। यदि षोडशी शस्त्र में 'गौरिवीत' का पाठ करे तो विहृत पढ़े (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से मिला देना चाहिये) क्योंकि उसको इसी प्रकार पढ़ा करते हैं। ३—यदि गौरिवीत पढ़ा जाय तो होता छन्द कं पदों को मिला जुला देता है (व्यतिषजति)। गायत्री और पंक्ति को मिला देता है "आत्वा वहन्तु" (ऋ० १।१६।१-३) और उप- सुश्रूणिहि (१।८२।१,३,४)। (पहला गायत्री है और दूसरा पंक्ति)। पुरुष गायत्री होता है और पशु पंक्ति। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिलाता है और उनको पशुओं में स्थापित करता है। गायत्री और पंक्ति मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान अनुष्टुभ् रूप वाणी से या वज्र से अलग नहीं होता। उष्णिग् और बृहती को मिला देता है जैसे "यदिन्द्र पृतनाज्ये" "अयन्तेते अस्तु हर्य्यत।" (ऋ० ४।२४।२५-२७ और ३।४४।१-३)। पुरुष उष्णिग् है और पशु बृहती। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। उष्णिग् और बृहती मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार वह अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद को त्रिष्टुभ् से मिला देता है। जैसे "धूर्ध्वस्मै" और "ब्रह्मन् वीर" (ऋ० ७।३४।४ तथा ७।२९।२) पुरुष द्विपद् है और वीर्य त्रिष्टुभ्। इस प्रकार पुरुष को वीर्य से मिला देता है; और वीर्यवान् कर देता है। यही कारण है कि मनुष्य वीर्य- वान् होकर सब पशुओं से अधिक बल वाला हो जाता है।