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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२२८ [ चौथी पञ्चिका बीस अक्षरों का द्विपद् और ४४ का त्रिष्टुभ् मिल कर ६४ अक्षर के दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान व अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद् और जगती को मिला देता है जैसे एष ब्रह्मा (आश्व० श्रौतसूत्र ६।२) और प्रतेमहे (ऋ० १०।९६।१-३)। पुरुष द्विपद् हैं और पशु जगती हैं, इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। इसलिये पुरुष पशुओं में प्रतिष्ठित होकर उनसे दुग्धादि भोजन प्राप्त करता है। और उन पर शासन करता है क्योंकि यह उसके वश में होते हैं। सोलह अक्षरों के द्विपद् और अड़तालीस अक्षरों की जगती मिलकर चौंसठ अक्षरों के दो अनुष्टुभ् हो जाते हैं। इस प्रकार यजमान वाणी रूपी अनुष्टुभ् और वज्र से अलग नहीं होता। वह अब नीचे के मंत्र बोलता है जिनमें उन नियत छन्दों से अधिक अक्षर हैं :—( अति छन्द ) ( १ ) त्रिकद्रुकेषु महिषोयवाशिरं ( ऋ० २।२२।१-३ ) ( २ ) प्रोष्वस्मै पुरोरथम् । ( ऋ० १०।१३३।१-३ ) छन्दों में से जो रस बहा वह अतिच्छन्दों में चला गया। इसीलिये इनको "अतिच्छन्द" कहते हैं। षोडशी शस्त्र सब छन्दों से बना है, इसलिये अतिच्छन्दों का पाठ किया जाता है। इस प्रकार होता यजमान को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों के षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (३)