ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context१४४ [ चौथी पञ्चिका अगर इस दिन अग्निष्टोम करें तो तीनों पवमान (प्रातः सवन, मध्य सवन और शाम के सवन के) अष्टाचत्वारिंश स्तोम में होने चाहिये। (अर्थात् स्तोत्रिय तृच को बार बार पढ़ कर ४८ कर लेना चाहिये) और अन्य (नौ) स्तोत्र चतुर्विंश स्तोम में। इस प्रकार ३६० स्तोत्रिय हो गये (३ × ४८ = १४४, ९ × २४ = २१६; १४४ + २१६ = ३६०) जितने कि वर्ष में दिन होते हैं। इस प्रकार वह दिनों वाले साल को शुरू करते हैं। परन्तु उक्थ्य को ही करना चाहिये (अग्निष्टोम को नहीं)। यज्ञ पशु-समृद्ध होता है। अगर सभी स्तोत्र चतुर्विंश स्तोम में होंगे तो प्रत्यक्ष ही यह दिन चौबीस गुना हो जायगा। इसलिये उक्थ्य ही करना चाहिये। (६) १३—(इस सत्र के) दो मुख्य साम होते हैं, बृहत् और रथंतर। यह बृहत् और रथंतर यज्ञ की दो नावें हैं जो उसको दूसरी ओर पार कर देती हैं। इन्हीं से यजमान साल को पार कर लेता है। या बृहत् और रथंतर दो पैर हैं। दिन (का कृत्य) सिर है। दो पैरों की कमाई सिर पर रक्खी जाती है। बृहत् और रथंतर दो पक्ष हैं। दिन का कृत्य सिर है। इन्हीं दो पक्षों से सिर को श्री तक ले जाते हैं। इन दोनों सामों को एक साथ नहीं छोड़ देना चाहिये। अगर सत्र करने वाले इन दोनों को साथ-साथ छोड़ देंगे तो जैसे नावों की रस्सियाँ कट जाने से वे इस किनारे से उस किनारे तक बहती फिरती हैं, इसी प्रकार यह भी बहते फिरेंगे। अगर वह रथंतर को छोड़ दें तो बृहत् के द्वारा दोनों ठहरे रहेंगे। और यदि बृहत् को छोड़ दें तो रथंतर के द्वारा दोनों ठहरे रहेंगे। जो वैरूप है वह रथंतर है और जो बृहत् है वह वैराज है। जो शाक्वर है वह रथंतर है, जो रैवत है वह बृहत् है।