ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय
Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय ] २४५ जो इस रहस्य को समझ कर सत्र का आरंभ करते हैं वे पाखों, महीनों और दिनों वाले साल को प्राप्त करके स्तोमों और छन्दों और देवों को प्राप्त करके तपों को तपते हुये और सोम पान करते हुये साल को बिताते हैं । जो इस संवत्सर से ऊपर कोई कृत्य करते हैं वह भारी बोझ को रख देते हैं । भारी बोझ पीठ को तोड़ देता है । वह जो पहले कर्मों को क्रमशः करता हुआ फिर उलटे क्रम से कृत्य करता है वह साल के कल्याणप्रद अन्त को प्राप्त कर लेता है । (७) १४—यह जो चतुर्विंश है वह महाव्रत है । बृहद् दिव सूक्त से होता वीर्य सींचता है ( ऋ० १०।१२०, तदिदास भुवनेषु- इत्यादि ) और महाव्रत दिन के कृत्य से इस वीर्य से सन्तान उत्पन्न कराता है । वीर्य सींचा जाय तो हर साल उपजता है । इसीलिये बृहद्दिव निष्केवल्य शस्त्र का भाग हो जाता है । जो इस रहस्य को समझ कर पहले क्रमशः कृत्य करता है और फिर दूसरे भाग को उलटे क्रम से करता है, वह बृह- द्विव सूक्त के द्वारा वर्ष के कल्याण-प्रद अन्त को पा लेता है । जो साल के इस पार और उस पार को जानता है वह संवत्सर के उस पार को सुगमता से पार कर लेता है । सत्र के शुरू का अतिरात्र एक सिरा है और दूसरा अति- रात्र दूसरा सिरा । जो इस रहस्य को समझता है वह साल के अच्छे अन्त को पा लेता है । जो साल के अवरोधन और उद्रोधन को जानता है, वह संवत्सर के कल्याण प्रद अन्त को पा लेता है। शुरू का अति- रात्र अवरोधन है और अन्त का अतिरात्र उद्रोधन । जो इस रहस्य को समझता है वह वर्ष को अच्छी तरह पार कर लेता है। जो संवत्सर के प्राण और उदान को समझता है