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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages

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२५० [ चौथी पञ्चिका विषुवत् रेखा है। इस इक्कीसवीं को करके देवों ने सूर्य्य को स्वर्ग में पहुँचा दिया। यह इक्कीसवीं जिस दिन दिवाकीर्त्य मंत्र (रचा गया) इसके पहले दस दिन होते हैं और पीछे दस दिन। बीच में यह होती है। इस प्रकार इसके दोनों ओर विराट् (दस संख्या वाले) होते हैं। इस प्रकार दोनों ओर विराट् से युक्त होकर यह (एकविंश अर्थात् सूर्य्य) इन लोकों के बीच में विघ्न को प्राप्त नहीं होता। देवों को डर लगा कि सूर्य कहीं स्वर्गलोक से गिर न जाय। इस लिए उन्होंने तीन लोकों को नीचे (खंभे के रूप में) लगा दिया। तीन स्तोम ही तीन स्वर्ग लोक हैं। उनको डर हुआ कि सूर्य्य ऊपर को न चला जाय। इस लिये उन्होंने उसके ऊपर तीन लोक लगा दिये। तीन स्तोम ही तीन स्वर्गलोक हैं। इस प्रकार (विषुवान् दिन से) पूर्व तीन सत्रह भागों वाले स्तोम होते हैं और पश्चात् तीन सत्रह भागों वाले स्तोम। बीच में इक्कीसवीं होती हैं। इसके इधर उधर "स्वरसाम" होते हैं। दोनों ओर से यह स्वरसामों से घिरा होता है इसलिये यह (सूर्य्य) इन लोकों के भ्रमण में विघ्न नहीं पाता। देव डर गये कि आदित्य स्वर्गलोक से गिर न पड़े। इस लिये उन्होंने तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा दी। स्तोम परम स्वर्गलोक हैं। देव डर गये कि आदित्य कहीं ऊपर से लौट न जावे। इस लिये उन्होंने ऊपर से तीन "परम स्वर्गलोकों" की टेक लगा दी। स्तोम परम स्वर्गलोक हैं।